Tuesday, December 20, 2011

रॉक स्टार- स्टीफेंस का लपाड़ा और हिन्दू की लौंडिया क्यों नहीं?

रॉक स्टार। अस्सी के दशक में जो कोशिश डिस्को डांसर ने की थी, उसके उनतीस साल बाद यही कोशिश रॉक स्टार की है। डिस्को डांसर का अव्वा अव्वा, रॉक स्टार के बेहतरीन निर्देशिक और रचित हव्वा हव्वा के सामने पत्तों की तरह उड़ जाता है। पटना से वास्ता रखने वाले इम्तियाज़ पर डिस्को डांसर का जादू नहीं होगा कहना मुश्किल है। डिस्को डांसर का अनिल भी फुटपाथ से कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है मगर रिश्तों की बुनियादी उलझनें उसे यह बता देती हैं कि कामयाबी की कीमत क्या होती है। मैं यहां डिस्को डांसर और रॉक स्टार की तुलना नहीं कर रहा। सिर्फ दोनों का ज़िक्र साथ-साथ कर रहा हूं। उस फिल्म में मिथुन गा रहे थे-कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब मैं बोल पाता नहीं था। रॉक स्टार का जनार्दन गा रहा है- जो भी मैं कहना चाहूं,बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे। जनार्दन इस उत्तर आधुनिक दौर में अति संचार और अति संवाद की जड़ताओं से निकल कर अपनी बुनियादी अहसास से संवाद करने की पीड़ा से गुज़र रहा है। कशिश और तपिश की निरंतरता डिस्को डांसर से लेकर रॉक स्टार तक में महसूस की जा सकती है। डिस्को डांसर ने उस वक्त के बारातियों को एक ऐसी चुनौती दी कि पटना के चिड़ैया टांड पुल के नीचे बारात रोक कर पटाखे के साथ डांस की पीड़ा पुल के दोनों तरफ जाम में फंसे लोगों ने ज़रूर महसूस की थी। बैंड मास्टरों का पसंदीदा गाना था आया मैं डिस्को डांसर। ढैन ढैन। रॉक स्टार के गाने बेहतरीन हैं। हव्वा हव्वा सुनते हुए सात ख़ून माफ का गाना डार्लिंग रोको न...भी याद आता है। कितना सुंदर गीत है ये हव्वा हव्वा।...पैरों से रानी फिर नौ दो ग्यारह। एक दिन में जूते बारह...राजा का चढ़ गया पारा...खबरी को पास पुकारा....देखो..वो जाती कहां...खबरी ने पीछा किया...रानी को घर से...जाते देखा...। उत्तर आधुनिक विमर्श में पुरानी आशंकाएं आज़ाद ख़्यालों का पीछा करती हैं। 

रॉक स्टार जनार्दन को जॉर्डन बनाकर बताती है कि कामयाबी और कुलीनता का ठेकेदार भले ही मालिश कराने वाला म्यूज़िक कंपनी का पंजाबीबागीय बंदानवाज़ हो मगर शोहरत में देसी टच की जगह नहीं। डिस्को डांसर में भी म्यूज़िक कंपनी वाला है मगर वो बंबइया है। पंजाबीबागीय नहीं। खैर शोहरत में भदेस नहीं चलेगा इसीलिए हिन्दू कालेज का कैंटीन वाला खूब समझाता है दिल का टूटना ज़रूरी है। इश्क़ ज़रूरी है। संगीत वहां से निकलता है। यानी जो रिजेक्टेड है वही रचनाकार है। जो एक्सेप्टेड है,वो बाज़ार है। जनार्दन को मार्केट के हिसाब से यह कहानी शुरू से ही ढालना चाहती है। ज़बरदस्ती ठेलकर। स्टीफेंस कालेज की कुलीनता पर आंच नहीं आने दी है इम्तियाज़ ने। मगर अपने ही कॉलेज हिन्दू कालेज की कुलीनता के साथ खूब छेड़छाड़ किया है। हिन्दू कॉलेज का जनार्दन सिर्फ दिल्ली का जाट नहीं बल्कि मिरांडा और स्टीफेंस की लड़कियों को हसरत से देखनेवाला ‘बिहारी माइग्ररेंट बट आईएस एसपिरेंट’ भी है। मैं इस प्लाट से चट चुका हूं। दिल्ली की सारी प्रेम कथाएं स्टीफेंस के स्वीकृत और हिन्दू के तिरस्कृत भाव से ही जन्म नहीं लेती हैं। 

इम्तियाज़ निहायत ही कुलीन निर्देशक हैं। ज़हनी तौर पर भी। वो आज की पीढ़ी के हैं जिसे पैकेजिंग बहुत अच्छी आती है। मगर कहानी के लिए जनार्दन का पात्र गढ़ता है और दिल्ली की ग़ैर कुलीन बस्तियों को फन यानी मस्ती के लिए खोजता यानी एक्सप्लोर करता है। जंगली जवानी किस वर्ग के ख्वाबों को सहलानेवाली प्रातदर्शनीय फिल्म हैं? हीर और जनार्दन पहली बार जंगली जवानी देखने जाते हैं। सिर्फ एक दिन के लिए। अमर थियेटर को बदनाम जगह के रूप में स्थापित करते हैं। वही जो एक कुलीन सोच होती है। उधर मत जाना। स्टीफेंस और हिन्दू के लौंडे लपाड़े गंदे नहीं होते, मगर एक दिन के लिए गंदे काम कर सकते हैं। ‘जस्ट लाइक अ ट्रिप’। गए और वापस आ गए। अपनी अच्छाई के खोह में। ये जगहें लाखों के जीवन का हिस्सा है मगर इम्तियाज़ जैसे कहानीकारों और हिन्दू स्टीफेंस के छात्रों के लिए फन यानी एकदिवसीय मस्ती का अड्डा। ताकि जब वो जीवन में अपने नेटवर्क की बदौलत कुछ हासिल कर लें तो ‘मेमोआयर्स’ यानी संस्मरण को रोचक बना सकें। पुराना किला के पीछे दारू पीने का प्रसंग वहां बैठे लोगों के स्टीरीयोटाइप को ही कंफर्म यानी पुष्टि करता है। निर्देशक का यही कुलीन पूर्वाग्रह प्राग में भी गंदे पब को ढूंढता है। एक दिन के लिए। जहां लेबर क्लास के लोग जाते हैं। क्या वो जगहें गंदी होती हैं? इम्तियाज़ को क्रांतिकारी तब मानता जब जनार्दन स्टीफंस का लौंडा लपाड़ा होता और हीर हिन्दू की ख़ूबसूरत हसीना। ख़ैर निर्देशक की आज़ादी होती है कैसे भी फिल्म बनाए। समीक्षक की आज़ादी होनी चाहिए कैसे भी फिल्म को देखे। उसका पैसा उसकी राय। हिन्दू के होने का कांप्लेक्स और स्टीफेंस का गर्वलेक्स किसी भी तरह से खंडित नहीं होता है। स्टीफेंस की सर्वोच्चता कायम रहती है। जॉर्डन तुम जाट नहीं हो, तुम बिहारी हो। पूछ लेना इम्तियाज़ से। तुम्हारा सांचा जाट का है मगर सच्चाई हिन्दी मीडियम बिहारी की है। भाभी वाला प्रसंग रेडियो एफएम के सोनिया भाभी और सविता भाभी डाट काम से प्रेरित है और अच्छा है। बेहतरीन। इसीलिए यह फिल्म उत्तर आधुनिक और पुरातन के बीच झूलती रहती है।

शहर को स्टीरीयोटाइप बनाने के साथ एक और कथा चलती है। निज़ामुद्दीन औलिया और भगवती जागरण की कहानी। पत्रकार जनार्जन के जॉर्डन बनने की कथा को हैरत से खोज रही है। शायद कामयाबी के बाद भी आखिरी बार पुष्टि की कोशिश हो रही है कि कोई गैरकुलीन स्टार कैसे बन जाता है। उसी क्रम में भगवती जागरण और निज़ामुद्दीन के दरबार के प्रसंगों को गढ़ा जाता है। संगीत समाज में बनता है। आसमान में नहीं। कोई महान संगीतकार अपने समाज का हिस्सा बने बिना पैदा ही नहीं हो सकता। इम्तियाज़ ने औलिया के दरबार और दरवाज़े को अलग ही कैमरे से भव्य बनाया है। लेकिन यह मत समझिये कि मैं फिल्म को रिजेक्ट कर रहा हूं। फिल्म के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़िये इसे। फिल्म देखते वक्त कई तरह के शहरों, मोहल्लों और गलियों के बीच आते-जाते रहना और एक खूबसूरत हसीना हीर को देखते रहने की चाहत में डूबे रहना अलग अहसास से भरता है। तभी मैंने फेसबुक पर लिखा था,शहर सांसों सा गुज़रता है,अहसासों में कोई क्यूं रहता है।

जनार्दन से जॉर्डन बनने और बिखर जाने का सफर सुखांत और दुखांत पैटर्न पर चलने का एक संतुलित प्रयास है। कहानी अच्छी बन रही है तो जोखिम क्यूं लिया जाए। निर्देशक जोखिम वहां लेता हैं जब वो कश्मीर में घुसता है। तिब्बत की आज़ादी को नायक की बेचैनियों से जोड़ता है। कश्मीर में हीर जनार्दन को कहती है 'हग' करो मुझे। अद्भुत दृश्य है। हिन्दी गाई(guy) पर हीर थोड़े समय के तरस खा लेती है। उसके इनोसेंस पर। जनार्दन हग कर चला जाता है। हग मतलब अल्पकालिक आलिंगन। प्राग में हीर उसे भूल जाती है। सिर्फ बीमारी से साबित नहीं होता कि वो जनार्दन को मिस कर रही है। खैर दोनों मिलते हैं और दिल्ली की मस्ती प्राग की मस्ती में बदल जाती है। पूरी फिल्म में कुलनीता की निरंतरता कहीं नहीं टूटती है। शादी के भीतर एक अतिरिक्त संबंध को मान्यता दे दी जाती है। दोनों कमज़ोर प्रेमी साबित होते हैं। हीर अपनी कुलीनताओं में जकड़ी नहीं होती और हिन्दी मीडियम टाइप जनार्दन को एक दिन के चुंबन की आज़ादी से ज़्यादा और आगे के लायक सोची होती तो इस कहानी में भूचाल आ जाता। रॉक स्टार एक बेहतरीन फिल्म होने के बाद भी रणबीर को डिस्को डांसर जैसी शोहरत और गहराई नहीं दे पायेगा। इसके बावजूद यह फिल्म रणबीर के स्टारडम की पहली औपचारिक फिल्म मानी जाएगी।

सोचता हूं कैमरे की इतनी अच्छी समझ रखनेवाला इम्तियाज़ डिस्को डांसर से आगे क्यों नहीं जा पाया? निश्चित रूप से उसने अच्छी फिल्म बनाई है। मगर उसे अपनी कहानी को स्टीफेंस और हिन्दू के बीच की ग्रंथियों से आज़ाद कर देना होगा। वो फालतू की और पचीस लोगों की हीन और गर्व गंथ्रियां हैं। हिन्दू कालेज का कैंटीनवाला दरअसल इम्तियाज़ से कह रहा है कि कहानी यहां नहीं हैं।। पूरे मन से देखा इस फिल्म को और मन भर देखा। रावन अगर पिट पिटा के नहीं गई होती तो रॉक स्टार को चुनौतियों का सामना करना पड़ता। रावन से घायल दर्शकों के लिए रॉक स्टार मरहम की तरह है। पूरा पैसा वसूल है। भावुकता के कई खूबसूरत लम्हें रचती है यह फिल्म। एक पलायनवादी तड़प कि नौकरी के बंधनों से मुक्त किसी को पाने के लिए सबकुछ गंवा देना ही चरम आध्यात्म है। जबकि ऐसा नहीं है। इम्तियाज़ अली एक अच्छे निर्देशक हैं। मगर अभी तक उन्होंने निर्देशन की ऐसी किसी ऊंचाई को स्पर्श नहीं किया जिससे उन्हें बेहद सृजनशील निर्देशक कहा जाए। कहानी के मामले में भी वो अभी तक कोई नई ज़मीन नहीं गढ़ पाए हैं। बहुत उम्मीद है इस निर्देशक से बस कोई इसे आजाद कर दे। कोई नई उड़ान का रास्ता दिखा दे।लेकिन जो भी इस फिल्म को देखकर लौटेगा, खुश होकर लौटेगा। रहमान के लिए इस नाचीज़ की नसीहत है, अल्फाज़ बर्बाद नहीं करते हमेशा, यादगार भी बनाते हैं। अपने संगीत को इतना हावी न होने दें कि बेहतरीन अल्फाज़ गा़यब हो जाए। न सुनाई दें न समझ आए। साफ साफ गाना होना चाहिए। कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था...तरा तरा..ढैन ढैन...याया...याइये....याया....। चलेगा मगर खो जाएगा। थोड़े समय के बाद।फिल्म बेहतरीन है। यह समीक्षा देखने के बाद की है। जब देख रहा था तब बहुत ही मज़ा आया। डूबा रहा।

Sunday, March 20, 2011

होली

परियों के रंग दमकते हों
जब शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की ......होली की राम राम जी...

Tuesday, February 1, 2011

today's view

अगर दुआ में ताकत है मौलबी तो बोतल हिला के दिखा , 
अगर नहीं तो 
आ और दो घुट मार और बोतल को हिलता देख 

Sunday, August 1, 2010

ONCE UPON A TIME (MUMBAIWOOD)


Have you ever seen a filmi film? The kind of film where everything is larger than life? The bullet hits the Rolex which stops so you know a man's time is up? The woman has a hole in the heart and has only a few years to live? The man looks out at the sea and wants it to be in his "baahen" (arms)? Heroines flutter their false eyelashes and fans get signatures on Rs 1,000 notes which they then tear with great flourish. Films spout lines such as, "Main tumhare bachche ki maa banne wali hoon."
Milan Luthria's film is that sort of film. It's overwritten, over acted, overcharged but also super fun. Nothing is simple here. Every dialogue is like a philosophical statement. "Jab dost bana kar kaam ho sakta hai to dushman kyon banaye," says Devgn's Sultan Mirza as he speaks to the dons of Mumbai--each one has had a movie made on him. "Jinki manzil ek hai woh raaste par hi milte hai," so says the heroine to her soon-to-be hero. As everyone knows the story is a fictional recreation of the rise of Mumbai's underworld, of the replacement of the gentler anti-social smuggling of Haji Mastan with the hard nosed, hard hearted gangsterism of Dawood Ibrahim. Devgn is Mirza/Mastan and Emraan Hashmi is Shoaib/Dawood. Mirza has his Madhubala (?) and Shoaib has his Mandakini. Mirza has his all white attire and Shoaib has his all black heart. Mirza is a boy who came to Mumbai in a "machli ki tokri" and Shoaib is the son of an honest police officer.
 yes, with some changes of character here and there it could be Company. It is not, not even because of Devgn's presence. It is part costume drama, part period film and part crime thriller. It is also all glamour, from the hair on Kangna's elaborate wigs to the tips of Devgn's white shoes. Luthria, a Bollywood talent who has for one reason or the other, been languishing on the periphery should come full front and centre with this, fullfilling the early promise of Kache Dhage. He is in command of his film, however melodramatic it may be. A love letter to Mumbai, this is a film that trots out every possible placard signalling it is the 70s. Yes, "Amit" has the intense eyes required to play Mirza in a film (Deewar, anyone?). Yes, Bobby's polka dot lie-up shirt and hot pants became quite the rage. Yes, Mastan was a Robin Hood character who helped the poor whenever he could. And yes, Dawood was a new age criminal who believed the "ghoda" (gun) was the source of all power and the supari was the solution for all ills.
The movie takes us back to the last years of innocence, when it was clear that the social fabric of Mumbai was tearing. When it was clear that crime paid, got you the bangla, the gadi and the girl. When the police tried to prop one gang against another to create chaos in the underworld. When the economy of shortages meant no opportunities for youngsters. When criminals started becoming more powerful than politicians.
You can understand why then that dialogues like this: ''duniye raakh ki tarah neeche hogi aur khud dhuye ki tarah upar'' make so much sense. As does this: "Himmat batai nahin jati, dikhai jati hai." The clash of civilisations, between Mastan's gentler way of doing business and Dawood's criminal ways could not be sharper. Hashmi has played impetuous upstart before and can now do this sort of role in his sleep but he brings a new sleeker danger to Dawood's role. Devgn is also now a past master at playing the conscience striken criminal--I smuggle those things for which the government doesn't give permission, not for which my conscience doesn't. Kangna has never looked lovelier and been more playful. This is one girl who has not come out of a bottle, or even if she has, the bottle is broken. Prachi Desai as Dawood/Shoaib's girlfriend, who is as "garam" as the food she serves, is suitably tremulous and pleading.
The tragedy is even Dawood's beginnings look so modest by today's hugely corrupt standards. He has a two-in-one and phone and expects his girlfriend to be happy. He is not. He is greedy. He wants Mumbai, never mind if the city becomes as dirty as his deeds.
You get the picture, hmm? The film is directed with precision, the drama at a tone that matches the decor, the cabaret, the dialogues. Its cinematography is by Aseem Mishra who shot New York as well. And even the walk-on parts are played pitch perfect, from Randeep Hooda's policeman, Agnel Wilson, who blames himself for creating a monster, and Naved Aslam is stoic as Patrick, Mastan/Mirza's Man Friday. As Mastan would say "har kitab ki kismat main library nahin hoti, kuch kabadi ki dukan main milti hain". But this little number belongs to a full house.
Watch it. It's like watching a retro fashion show with some cool gun battles thrown in. Lots of rain, lots of crashing of the waves, moody lighting, and dialogues that echo Salmi-Javed at their purplest prose. Ahh. Mumbai when it was still Bombay.

Sunday, July 4, 2010

ब्रांड होती महबूबा और कार्ड होता महबूब




फैबइंडिया की चादर में लिपट कर
सरकाये थे जब उसने पांव अपने
वुडलैंड की चप्पलों में
लुई वित्तॉं के थैले में भर कर मेकअप का सामान
निकली थी वो बाहर जाने को मेरे साथ
उसकी खूबसूरती एक ब्रांड की मानिंद
धड़कने लगी मेरे भीतर
दुनिया के तमाम बिलबोर्ड से उतरकर
बिल्कुल करीब आ गई थी मेरी बांहों के
वैन ह्यूसन की कमीज़ का कॉलर
रे बैन के चश्मे ने मेरे चेहरे को बना दिया
दमदार और दामदार
उसकी मुस्कान से न जाने क्यों बार बार
टपक रही थी
निंबूज़ की प्यास और उसके विज्ञापन से छिटकते
पानी के फव्वारे
राडो घडी से लदी उसकी कलाई
पकड़ने को जी चाहा मगर दाम के टैग ने
दूर कर दिया मुझे
उस एकांत में सुंदरी से
पैराशूट नारियल में रात भर सोक हुए थे उसके बाल
गार्नियर की शैम्पू में धुल कर जब हल्के हुए
तो हवाओं ने भी कर ली छेड़खानी
लहराते बालों को क्या मालूम
टकराने का लोक लिहाज़
मेरे चेहरे पर अटके उसके बालों ने
वही तो कहा था
तुम्हारी महबूब किसी अप्सरा लोक से नहीं आई है
अख़बारों में छपे विज्ञापन की कटिंग से बनाई गई है
वो न जाने किस किस की अदाओं की
फोटोकॉपी है।
है तुम्हारी मोहब्बत
मगर ओरिजनल नहीं है।


राजा रवि वर्मा की पेटिंग में अटकी उस औरत का देह
जिस पर लिखी जानी थी कविता,
स्थगित कर कवि ने रविवार की सुबह
बाज़ार के तमाम उत्पादों के बीच अपने प्रेम का साक्षात्कार किया
कई ब्रांडों में समाई उस औरत से लिपट कर
डेबिट कार्ड से चुका दिये
इश्क के खर्चे

Sunday, May 30, 2010

चीयर बालाओ का चीयर करियर



आज नहीं तो कल कभी न कभी ऐसा दिन आएगा जब हरेक खेल में चीयर बालाओ का होना अनिवार्य कर दिया जायेगा . लेकिन ये किस रूप में होगा ये कहना तो अभी मुस्किल है परन्तु हम कल्पना के घोड़े तो दौड़ा ही सकते है . मनुष्य का काल्पनिक होना बहुत जरुरी है और कल्पना के घोड़े दौड़ाने भी चाहिए . कल्पना कीजिये मैच शुरु होने वाला  है सभी अपने अपने जगह पे तैयार हैं चीयर बालाओ के साथ, और  रीतिकाल के विशेषग्य कमेन्ट्री कर रहे होंगे कुछ इस तरह :  
                        चीयर  बालाओ ने तीन  ठुमके लेफ्ट साइड के स्टैंड के लोगो के लिए लगाये और अगली गेंद पर जब चौथे ठुमके की मांग दर्शक कर रहे  थे तब उसने रिवर्स ठुमका लगाया और ये राईट साइड स्टैंड के लोगो के कलेजे  के पार. तब चीयर बालाओ की  रेंकिंग  होगी,  फलाना चीयर  बाला चिअरिंग के लिए बचपन से ही समर्पित है तेंदुलकर की तरह ,कितने मैच में तो टीम इनके ठुमको के बजह से ही जीती है .ड्रो होने पे चीयर  बालाओ के ठुमके से ही जीत का फैलसा होगा की किस टीम के बालाओ ने कितने सफाई के साथ ठुमके लगाये . किसी खिलाडी को मैदान से बहार का रास्ता दिखाना है तो उसके पीछे फील्डर लगाने की जरुरत नहीं है एक युबा चीयर बाला को उसके सामने लगा दो , खिलाडियों के पोजीसन चेंज करने से जायदा प्राथमिकता चीयर   बालाओ के पोजिसन पर होगा की कौन सी  बाला को किस पोजीसन पार लगाया जाय . मुझे तो ऐसे लगता है की जैसे लडको के खेल में चीयर बालाओ को लगाया जाता है उसी तरह लड़कियों के खेल के लिए चीयर  बालकों  को लगाया जायेगा . संभाबना इसकी भी कम नहीं है की चीएर बालाओ के जीत पे देश की जीत माना जाये और हार पे देश की हार.


भाई ये खेल का नशा नहीं है ये तो चीएर बालिकाओ/बालक  का नशा है जिसके पीछे सारा देश पगलाया घूमता है इसके ग्लैमर के पीछे टुन्न ........

Sunday, May 16, 2010

बाजार की नई पहचान - "ही"

आईआईएम अहमदाबाद वाले फालतू की चीज़ों पर रिसर्च करते रहते हैं। कभी इस पर रिसर्च करनी चाहिए कि बाज़ार जगत में 'ही' का क्या महत्व है। 'ही' लगाने से किस तरह की uniqueness  का निर्माण होता है। इसकी शुरूआत कैसे हुई। रिश्ते ही रिश्ते से चलकर शीशे ही शीशे,बिस्तरे ही बिस्तरे,नौकरी ही नौकरी से होते हुए हर एक माल वाली दुकान की punch लाइन बन गई । छुट ही छुट  ।" ही" शब्द का इस्तमाल जितना साहित्यकारों ने नहीं किया उतना हिन्दी के बाज़ार ने किया है। दुकानों की भीड़ में " ही" एक अलग पहचान देती है। लगता है कि दुकानदार विशेषज्ञ है लोगो का ध्यान खीचने में । कई बार होता है तो कई बार "ही" के सहारे झांसा भी देता है। आप को भी "ही" गंथ की रचना में सहयोग देना चाहिए । किसी न्यूज़ चैनल या अखबार इस punch लाइन का use क्यों नहीं करती  है-ख़बरें ही ख़बरें,देख तो लें। डॉक्टर अपने बोर्ड के नीचे लिखवा दें-इलाज ही इलाज । कामनवेल्थ गेम्स का नारा बदलवा दीजिए। खेल ही खेल। केंद्र सरकार को भी इससे सिख लेनी चाहिए ,नरेगा ही नरेगा ,महिलाओ के लिए आरक्षण ही आरक्षण ,सर्बजनिक स्थल पर लिख दे पुरुष ही पुरुष , महिलाये ही महिलाये ,अब तो नारायणमूर्ति को भी लिखना चाहिए-इंफोसिस,बीपीओ ही बीपीओ। कंपनी अपने आप गांव गांव में पहुंच जाएगी। इसकी लोकप्रियता में चार चांद लग जायेंगे।


अब तो ऐसा लगता है  "ही " हीमैन बन गया है।