Sunday, August 1, 2010

ONCE UPON A TIME (MUMBAIWOOD)


Have you ever seen a filmi film? The kind of film where everything is larger than life? The bullet hits the Rolex which stops so you know a man's time is up? The woman has a hole in the heart and has only a few years to live? The man looks out at the sea and wants it to be in his "baahen" (arms)? Heroines flutter their false eyelashes and fans get signatures on Rs 1,000 notes which they then tear with great flourish. Films spout lines such as, "Main tumhare bachche ki maa banne wali hoon."
Milan Luthria's film is that sort of film. It's overwritten, over acted, overcharged but also super fun. Nothing is simple here. Every dialogue is like a philosophical statement. "Jab dost bana kar kaam ho sakta hai to dushman kyon banaye," says Devgn's Sultan Mirza as he speaks to the dons of Mumbai--each one has had a movie made on him. "Jinki manzil ek hai woh raaste par hi milte hai," so says the heroine to her soon-to-be hero. As everyone knows the story is a fictional recreation of the rise of Mumbai's underworld, of the replacement of the gentler anti-social smuggling of Haji Mastan with the hard nosed, hard hearted gangsterism of Dawood Ibrahim. Devgn is Mirza/Mastan and Emraan Hashmi is Shoaib/Dawood. Mirza has his Madhubala (?) and Shoaib has his Mandakini. Mirza has his all white attire and Shoaib has his all black heart. Mirza is a boy who came to Mumbai in a "machli ki tokri" and Shoaib is the son of an honest police officer.
 yes, with some changes of character here and there it could be Company. It is not, not even because of Devgn's presence. It is part costume drama, part period film and part crime thriller. It is also all glamour, from the hair on Kangna's elaborate wigs to the tips of Devgn's white shoes. Luthria, a Bollywood talent who has for one reason or the other, been languishing on the periphery should come full front and centre with this, fullfilling the early promise of Kache Dhage. He is in command of his film, however melodramatic it may be. A love letter to Mumbai, this is a film that trots out every possible placard signalling it is the 70s. Yes, "Amit" has the intense eyes required to play Mirza in a film (Deewar, anyone?). Yes, Bobby's polka dot lie-up shirt and hot pants became quite the rage. Yes, Mastan was a Robin Hood character who helped the poor whenever he could. And yes, Dawood was a new age criminal who believed the "ghoda" (gun) was the source of all power and the supari was the solution for all ills.
The movie takes us back to the last years of innocence, when it was clear that the social fabric of Mumbai was tearing. When it was clear that crime paid, got you the bangla, the gadi and the girl. When the police tried to prop one gang against another to create chaos in the underworld. When the economy of shortages meant no opportunities for youngsters. When criminals started becoming more powerful than politicians.
You can understand why then that dialogues like this: ''duniye raakh ki tarah neeche hogi aur khud dhuye ki tarah upar'' make so much sense. As does this: "Himmat batai nahin jati, dikhai jati hai." The clash of civilisations, between Mastan's gentler way of doing business and Dawood's criminal ways could not be sharper. Hashmi has played impetuous upstart before and can now do this sort of role in his sleep but he brings a new sleeker danger to Dawood's role. Devgn is also now a past master at playing the conscience striken criminal--I smuggle those things for which the government doesn't give permission, not for which my conscience doesn't. Kangna has never looked lovelier and been more playful. This is one girl who has not come out of a bottle, or even if she has, the bottle is broken. Prachi Desai as Dawood/Shoaib's girlfriend, who is as "garam" as the food she serves, is suitably tremulous and pleading.
The tragedy is even Dawood's beginnings look so modest by today's hugely corrupt standards. He has a two-in-one and phone and expects his girlfriend to be happy. He is not. He is greedy. He wants Mumbai, never mind if the city becomes as dirty as his deeds.
You get the picture, hmm? The film is directed with precision, the drama at a tone that matches the decor, the cabaret, the dialogues. Its cinematography is by Aseem Mishra who shot New York as well. And even the walk-on parts are played pitch perfect, from Randeep Hooda's policeman, Agnel Wilson, who blames himself for creating a monster, and Naved Aslam is stoic as Patrick, Mastan/Mirza's Man Friday. As Mastan would say "har kitab ki kismat main library nahin hoti, kuch kabadi ki dukan main milti hain". But this little number belongs to a full house.
Watch it. It's like watching a retro fashion show with some cool gun battles thrown in. Lots of rain, lots of crashing of the waves, moody lighting, and dialogues that echo Salmi-Javed at their purplest prose. Ahh. Mumbai when it was still Bombay.

Sunday, July 4, 2010

ब्रांड होती महबूबा और कार्ड होता महबूब




फैबइंडिया की चादर में लिपट कर
सरकाये थे जब उसने पांव अपने
वुडलैंड की चप्पलों में
लुई वित्तॉं के थैले में भर कर मेकअप का सामान
निकली थी वो बाहर जाने को मेरे साथ
उसकी खूबसूरती एक ब्रांड की मानिंद
धड़कने लगी मेरे भीतर
दुनिया के तमाम बिलबोर्ड से उतरकर
बिल्कुल करीब आ गई थी मेरी बांहों के
वैन ह्यूसन की कमीज़ का कॉलर
रे बैन के चश्मे ने मेरे चेहरे को बना दिया
दमदार और दामदार
उसकी मुस्कान से न जाने क्यों बार बार
टपक रही थी
निंबूज़ की प्यास और उसके विज्ञापन से छिटकते
पानी के फव्वारे
राडो घडी से लदी उसकी कलाई
पकड़ने को जी चाहा मगर दाम के टैग ने
दूर कर दिया मुझे
उस एकांत में सुंदरी से
पैराशूट नारियल में रात भर सोक हुए थे उसके बाल
गार्नियर की शैम्पू में धुल कर जब हल्के हुए
तो हवाओं ने भी कर ली छेड़खानी
लहराते बालों को क्या मालूम
टकराने का लोक लिहाज़
मेरे चेहरे पर अटके उसके बालों ने
वही तो कहा था
तुम्हारी महबूब किसी अप्सरा लोक से नहीं आई है
अख़बारों में छपे विज्ञापन की कटिंग से बनाई गई है
वो न जाने किस किस की अदाओं की
फोटोकॉपी है।
है तुम्हारी मोहब्बत
मगर ओरिजनल नहीं है।


राजा रवि वर्मा की पेटिंग में अटकी उस औरत का देह
जिस पर लिखी जानी थी कविता,
स्थगित कर कवि ने रविवार की सुबह
बाज़ार के तमाम उत्पादों के बीच अपने प्रेम का साक्षात्कार किया
कई ब्रांडों में समाई उस औरत से लिपट कर
डेबिट कार्ड से चुका दिये
इश्क के खर्चे

Sunday, May 30, 2010

चीयर बालाओ का चीयर करियर



आज नहीं तो कल कभी न कभी ऐसा दिन आएगा जब हरेक खेल में चीयर बालाओ का होना अनिवार्य कर दिया जायेगा . लेकिन ये किस रूप में होगा ये कहना तो अभी मुस्किल है परन्तु हम कल्पना के घोड़े तो दौड़ा ही सकते है . मनुष्य का काल्पनिक होना बहुत जरुरी है और कल्पना के घोड़े दौड़ाने भी चाहिए . कल्पना कीजिये मैच शुरु होने वाला  है सभी अपने अपने जगह पे तैयार हैं चीयर बालाओ के साथ, और  रीतिकाल के विशेषग्य कमेन्ट्री कर रहे होंगे कुछ इस तरह :  
                        चीयर  बालाओ ने तीन  ठुमके लेफ्ट साइड के स्टैंड के लोगो के लिए लगाये और अगली गेंद पर जब चौथे ठुमके की मांग दर्शक कर रहे  थे तब उसने रिवर्स ठुमका लगाया और ये राईट साइड स्टैंड के लोगो के कलेजे  के पार. तब चीयर बालाओ की  रेंकिंग  होगी,  फलाना चीयर  बाला चिअरिंग के लिए बचपन से ही समर्पित है तेंदुलकर की तरह ,कितने मैच में तो टीम इनके ठुमको के बजह से ही जीती है .ड्रो होने पे चीयर  बालाओ के ठुमके से ही जीत का फैलसा होगा की किस टीम के बालाओ ने कितने सफाई के साथ ठुमके लगाये . किसी खिलाडी को मैदान से बहार का रास्ता दिखाना है तो उसके पीछे फील्डर लगाने की जरुरत नहीं है एक युबा चीयर बाला को उसके सामने लगा दो , खिलाडियों के पोजीसन चेंज करने से जायदा प्राथमिकता चीयर   बालाओ के पोजिसन पर होगा की कौन सी  बाला को किस पोजीसन पार लगाया जाय . मुझे तो ऐसे लगता है की जैसे लडको के खेल में चीयर बालाओ को लगाया जाता है उसी तरह लड़कियों के खेल के लिए चीयर  बालकों  को लगाया जायेगा . संभाबना इसकी भी कम नहीं है की चीएर बालाओ के जीत पे देश की जीत माना जाये और हार पे देश की हार.


भाई ये खेल का नशा नहीं है ये तो चीएर बालिकाओ/बालक  का नशा है जिसके पीछे सारा देश पगलाया घूमता है इसके ग्लैमर के पीछे टुन्न ........

Sunday, May 16, 2010

बाजार की नई पहचान - "ही"

आईआईएम अहमदाबाद वाले फालतू की चीज़ों पर रिसर्च करते रहते हैं। कभी इस पर रिसर्च करनी चाहिए कि बाज़ार जगत में 'ही' का क्या महत्व है। 'ही' लगाने से किस तरह की uniqueness  का निर्माण होता है। इसकी शुरूआत कैसे हुई। रिश्ते ही रिश्ते से चलकर शीशे ही शीशे,बिस्तरे ही बिस्तरे,नौकरी ही नौकरी से होते हुए हर एक माल वाली दुकान की punch लाइन बन गई । छुट ही छुट  ।" ही" शब्द का इस्तमाल जितना साहित्यकारों ने नहीं किया उतना हिन्दी के बाज़ार ने किया है। दुकानों की भीड़ में " ही" एक अलग पहचान देती है। लगता है कि दुकानदार विशेषज्ञ है लोगो का ध्यान खीचने में । कई बार होता है तो कई बार "ही" के सहारे झांसा भी देता है। आप को भी "ही" गंथ की रचना में सहयोग देना चाहिए । किसी न्यूज़ चैनल या अखबार इस punch लाइन का use क्यों नहीं करती  है-ख़बरें ही ख़बरें,देख तो लें। डॉक्टर अपने बोर्ड के नीचे लिखवा दें-इलाज ही इलाज । कामनवेल्थ गेम्स का नारा बदलवा दीजिए। खेल ही खेल। केंद्र सरकार को भी इससे सिख लेनी चाहिए ,नरेगा ही नरेगा ,महिलाओ के लिए आरक्षण ही आरक्षण ,सर्बजनिक स्थल पर लिख दे पुरुष ही पुरुष , महिलाये ही महिलाये ,अब तो नारायणमूर्ति को भी लिखना चाहिए-इंफोसिस,बीपीओ ही बीपीओ। कंपनी अपने आप गांव गांव में पहुंच जाएगी। इसकी लोकप्रियता में चार चांद लग जायेंगे।


अब तो ऐसा लगता है  "ही " हीमैन बन गया है।



Thursday, May 13, 2010

हमारी पहचान क्या है नाम या नंबर ?



नाम ग़ुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है। ग़र याद रहे। बॉलीवुड का यह पोपुलर गाना आज सच साबित हो रहा है।  पहचान के तमाम निशान आपकी आवाज़ और आपके फ़ोन नंबर  में रह गये हैं ।  
तब से सोच रहा हूं कि क्या अब मोबाइल का नंबर हमारी पहचान का नया हिस्सा बन चुका है। क्या अब हम नंबर से पहचाने जाने लगे हैं। फोन नंबर को लेकर हमारी झिझक खतम हो गई है। पहले हम नंबर सभी को नहीं बताते थे। छुपाते थे। अब नाम से पहले नंबर या नाम के साथ नंबर ज़रूर बताते हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे लगते हैं।
हमारे देश में पहचान को लेकर सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर कोशिशें चलती रहती हैं।लोग अपनी पहचान खुद गढ़ रहे हैं। कई लोग दीवारों पर सिर्फ नंबर छोड़ कर अनंत संसार में गुम हो जाते हैं। डायल कीजिए और आपको मिल जायेंगे। नंबर अलग अलग होता है। एक नाम के सौ लोग होते हैं। एक इलाके और एक भाषा के सौ लोग होते हैं। एक नंबर का एक ही आदमी होता है। नंबर तभी मिलता है जब आपकी पहचान सत्यापित होती है। पता सही होता है। मोबाइल नंबर है तो आदमी फर्ज़ी नहीं हैं। ये भाव पैदा हो रहा है। यह एक बड़ा बदलाव हमारे समाज में हो चुका है।
सारी बातें दिमाग़ में इसलिए घूम रही हैं क्योंकि सरकार यूनिक पहचान नंबर ला रही है। क्या हम देख पा रहे हैं कि नंबर अभी से ही हमारी पहचान का हिस्सा बन चुका है। यूनिक पहचान नंबर  समझने की कोशिश कर रहा हूं कि यह कैसे हो रहा है कि नाम की जगह नंबर प्रमुख होता जा रहा है। मेरा नंबर ही मेरी पहचान है। ग़र याद रहे। क्या ऐसे भी गाना गाया जाएगा।
 आज आईडिया कंपनी का बिज्ञापन सच प्रतीत हो रहा है  । 

Saturday, March 20, 2010

Different Degrees of Woman Empowerment

The Yadav troika of Mulayam, Lalu and Sharad will do anything to block the Women’s Reservation Bill. Soon after it was was passed in the Rajya Sabha, but the stauts of woman in bastions—Saifai in Uttar Pradesh and Madhepura in Bihar—and found women’s empowerment at the Panchayat level .
Pooja Devi, 44, was elected sarpanch from Larkhaur on a seat reserved for women, but villagers address her husband Avadh Kishore Agnihotri as “pradhanji”. They call Pooja Devi “pradhanin”, or the woman of the pradhan’s family. Larkhaur is about five km down the dusty road to Jaswant Nagar from the shiny and pampered oasis of Saifai, the village Mulayam Singh Yadav calls home; it falls in the Jaswant Nagar Vidhan Sabha constituency currently represented by his brother Shiv Pal Singh Yadav.
Uttar Pradesh is scheduled to host the fourth round of elections later this year after the institution of 33 per cent reservation for women in tandem with caste-based reservation in all three tiers of the panchayati raj system, but the language of discrimination against the elected woman representative is writ large. Mostly, it accurately mirrors the distribution of power in the household of the pradhan.
But Pooja Devi doesn’t see it that way. “They call him ‘pradhanji’ to give him barabari (equal billing) with me, so that he doesn’t feel slighted,” she insists.
At home, Pooja Devi doesn’t sit down in the presence of her elder brother-in-law or sister-in-law. For her work as pradhan outside the house, she depends on her husband to drive her around on his motorbike. The first she sees as a small compromise for keeping peace in the house: “There is a big difference between the city and the village. Here, some things don’t change, and appearances must be kept up, especially at home,” she explains. The second, she dismisses as matter of practical necessity: “How else will I go? There is no public mode of conveyance available to me. So my husband must take me to the meetings.” All 34 woman pradhans of Saifai block, she points out, are accompanied by either their husbands or their sons to these meetings

Courtsy: Indian Express

Saturday, February 27, 2010

आज क्या लिखते प्रभाष जोशी?

बहुत दिन हो गए प्रभाष जोशी को गुजरे हुए, कुछ दिन तक कई प्रकार की चर्चाएँ हुई पत्रकारिता जगत में सच बताऊँ तो हर कोई चिंतित था की जिवंत पत्रकारिता को अब कौन संभालेगा खैर ये चर्चा अब ख़त्म हो चुकी है पत्रकारिता अपने भरोसे बढाती जा रही है, खैर छोडिये इन बातों को आप सोचेंगे की आज प्रभाष जोशी को में क्यूँ याद कर रहा हूँ तो सोचिये पत्रकारिता के इस महानतम के क्रिकेट प्रेम के बारे में , याद करें तो जब गए थे तब भी सचिन तेंदुलकर ने १७५ रन बनाए थे , कल तो सचिन ने २०० बना लिए , पिछली बार अगर प्रभाष जोशी अगर बच भी जाते तो आज जरुर गुजर जाते और अगर बच जाते तो अगले दिन के जनसत्ता में कुछ ऐसा जरुर लिखते जो हमेश से उनकी आदत रही थी.
याद करते हैं प्रभाष जोशी के लेखनी को जब भी भारत मैच जीतती थी या ऐसे कहे जब भी सचिन अच्छा खेलता था प्रभाष जोशी जरुर लिखते थे। अपनी ही भाषा थी उनकी, लगता था जैसे बुंदेलखंड के समाचार पत्र को पढ़ रहे हैं भाषा का एक नया ही जोर। जिसे प्रभाष से पहले कोई सोचता भी नहीं था । कोई नहीं जनता था एक ऐसा पत्रकार भी होगा जो देहाती भाषा का राष्ट्रीय पत्रकारिता में प्रयोग करेगा, क्रिकेट के उनके प्रेम को कौन नहीं जनता सच कहे to जनसता के पहले पेज का निचला हिस्सा तो जैसे ख़त्म ही हो गया विशेष कर ऐसे दिन जब सचिन २०० रन बनाता है , आज दो दिन हो गए सचिन को २०० रन बनाए हुए पता नहीं क्यों मेरी नजर बार-बार जनसत्ता के निचले भाग पर टिक जाती है की शायद प्रभाष जोशी की वही लेखनी दिख जाएँ।

Sunday, February 21, 2010

tourism show in India

tourism in india has major boost in the past decade since the indian govt. realized the great potential of tourism of india during vacations, i must tell you not in vacations but also in non peak hours. tourism of india has grown by leaps and bounds with great influx of tourists from throughout the world who have been irresttably attractive to the travelers.
india has the right tourism potential and attraction to captivate all types of tourists wheather it is adventurous tour cultural explorations, pilgrimages, visit to the beautiful beaches or to the scanic mountain resorts, Tourism of india has it all for you.
now i tell you the significant facts and identify tourism live. when we talk about indian tourism , then tourism is the largest service industry in india, with a contribution of 6.23% to the national GDP and 8.78% of the total employment in india. India witnessed more than 5 million annual foriegn tourist arrivals and 562 million domestic tourism visits. The tourism industry in india generated about us$100 billion in 2008 and that promotion of tourism in india and mountains the "incredible india" campaigns. according to world travel and tourism council of india, India will be a tourism hotspot from 2009-2018 . after these example we are convincingly expect that tourism in india is really a good hit.

Miracal:Economic growth in Bihar

After the report published by Central Statistical Organization in last month that Bihar gets second position in terms of growth, this news become miracle! Total growth rate approx 11% after Gujarat. All the political parties engage to publish this news to convert in to vote bank. Do you really believe this?It is true that in last four years with Nitish Kumar, Bihar government shows some determination in terms of development. Some areas surely get improved like Road, Health & law and Order but the required continuity would possible with only one condition if Nitish Kumar gets second term.

The data shows imagine swing in agriculture from year to year .In last five year growth averaged 11% but only 8.3% in last six year. So we can say that Bihar growing with 8-11% and its miracle growth. However politicians are still uninterested in domestic growth and growth would not be winning factor in Bihar. Even after the data published by CSO Bihar politicians are surprise to hear about it. It’s true that government development spending has zoomed from 2000 crore to 16000 crore per year. Most impressive has been raised in road construction from 384km in 2004-05 to 2417km in 2008-09. In Law and order terms, in Lalu’s time brash goons showed off their guns in public. Today no gunman is visible. 38000 peoples convicted by Nitish Government including politician also. 6 year ago, building a new house or booking new bike in rural area not often but today both are booming. It’s strange that two wheeler sales in rural area in Bihar gets imagining boom. Now u can find approx each household have at least a motor bike. But it would be continue if Nitish Kumar gets elected again.

This seems little bit difficult.

Thursday, February 18, 2010

नक्सलवाद या सरकार का नाकारापन?

आज बहुत दिन से देश में न तो मार्क्सवादी और न ही माओवादी खबरों में हैं, आम संवेदनशील साधारण जनता की तरह मुझे भी देश के इन दो धरा के बारे में जानने की इच्छा तो होती ही है, मार्क्सवादी को छोड़ भी दिया जाये तो माओवादी जिसे दुसरे शब्दों में नक्सली कहा जाता है के बारे में कुछ सोचने का मन हुआ है। आखिर कौन है ये नक्सली क्या परेशानी है इनको हमसे या हमको इनसे। ये भी तो हमारी तरह इस देश के नागरिक हैं तो फिर ये प्रशाशन से इतनी दुश्मनी क्यूँ निकल रहे हैं। इन समस्याओं के हल तलाशने के लिए हमें कुछ बारीक़ बातों पर ध्यान देना होगा। देखें तो देश में नक्सल समस्या उन्हीं इलाकों में है जहाँ सरकार पहुँच नहीं पाती है।
सरकारी तंत्र की विफलता इन नक्सल प्रभावित इलाकों में साफ़ दिखाती है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर सरकारी पैसों को हजम करने की कोशिशों से ज्यादा प्रयास कभी नहीं दिखे। सरकार अक्सर ऐसे उपकरणों की तलाश में रहते हैं जिनसे जब चाहे जैसे चाहे नागवार गुजरने वाली आवाज को चुप कराया जा सके। ऐसे में अगर विरोधी स्वर गूंजे तो दबाने की कोशिश तो होगी ही। समय के साथ नक्सलवादी और सरकार के बीच गतिरोध बढ़ता घटता रहता है। खैर ये तो १००% सच है की नक्सल आन्दोलन जायज नहीं है। सच कहें तो नक्सल आन्दोलन कैंसर कोशिकाओं की भांति भारत के विभिन्न हिस्सों में फैलता जा रहा है। क्रांति के नाम पर न केवल अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है, बिदेशी आतंकी संगठनों के साथ सांठ-गांठ की बात सामने आती रहती है। सच कहें तो छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के माध्यम से पहली बार नक्सलियों को वैचारिक और मैदानी दोनों मोर्चों पर शिकस्त देने के प्रयास शुरू हुए। बताते चलूँ की सलवा जुडूम एक ऐसा आन्दोलन है जिसमे नक्सलियों से लड़ने के लिए सरकारके मदद से ग्रामीण इलाकों में फ़ौज तयार किया जाये।
अंत में कुछ ऐसा जिसके बारे में शायद कम ही लोगों को पता हो, पंजाब के मशहूर नक्सलवादी नेता हकम सिंह ने यदि मनमोहन सिंह को बचने की कोशिश नहीं की होती तो वे इस समय नक्सलवादियों के समर्थक होने के इल्जाम में जेल में होते।अतः ये सच है की देश में बढ़ता नक्सलवाद हमारे, आपके सभी के लिए चिंता का विषय है, लेकिन हमें इन नक्सलवादियों से नफ़रत करने से पहले इनके समस्याओं के मर्म को समझाने होगा क्यूँ की आखिर वो भी इन्सान है?

Saturday, February 13, 2010

हमारे समाज के ठेकेदार.......News चैनल

अभी कल ही एक फिल्म रिलीज़ हुई MY NAME IS KHAN लेकिन फिल्म रिलीज़ होने से पहले जो हंगामा हुआ उसका तो पूछिए ही मत .
महाराष्ट्र  में एक राजनितिक पार्टी है  शिव सेना या यूँ  कहिये की मुंबई की पार्टी है उसने अफसरशाही फरमान जारी क्या  किया की फिल्म को रिलीज़ नहीं होने देंगे, सारे न्यूज़ चैनल को तो ब्रेकिंग  न्यूज़ मिल गयी.  फिछले दस पंद्रह दिनों से पुरे दिन न्यूज़ चैनल पर यही देखने को मिला है उस पार्टी को जिसको देश के दुसरो राज्यों में लोग जानते भी नहीं है इस मीडिया ने ऐसे तरजीह दी जैसे देश का राष्ट्रपति हो, ऐसे लग रहा हो जैसे समाज सुधारक बन गये है ऐसे समाज सुधारक जिसको देश १ % जनता भी नहीं देखती है, अपने आपको समाज को बदलने का दाबा करते है. ये सारे समाज सुधारक चैनल फ्री चैनल नहीं है इनको देखने के लिए आपको DTH जैसे सर्विस पर भी पैसे देने होंगे पर इनको कौन समझाए की समाज को खबरों से जागरूक करने के लिए समाज तक पहुचना भी पड़ता है ! TRP में नंबर वन आने का क्या फायदा जिसकी रेटिंग १० घरो से निकला  जाता हो.  न्यूज़ चैनल में न्यूज़ तो दिखाओ टुचों बाले खबर के जगह कुछ देश के लोगो, उनकी परेशानियों , जरुरत बाली खबर तो दिखाओ , देश की जनता गावो में रहती है, सत्ता के गलियारों से निकल कर गावो तक तो जाओ.  इनके समझ में कैसे आये की इनकी भी आदत नेता की तरह हो गयी है . नेता AC  में बैठकर देहात की देश को चलते है  और ये न्यूज़ चैनल बाले समाजके ठेकेदार AC  में  बैठकर जनता को न्यूज़ सुनाते है . ऐसा लगता है की एक AC   वाला  दुसरे AC वाले को  बिना AC  के  देश का हाल बता रहे है.
सही कहा है किसी ने चोर चोर मौसरे भाई.......................

Sunday, February 7, 2010

बस मुस्कुराते हीं रह गए नीतीश बाबु.

बिहार परेशान है क्या करे मुख्यमंत्री साहब ध्यान ही नहीं दे रहे हैं, कहते फिर रहे हैं " मेरे पास कोई बटन नहीं है जिसे दबा कर चीजें बदल दूँ। बड़ी आसानी से कह रहे है जब भी फंसते हैं कह देते है पिछली सरकार ने हालात काफी ख़राब कर छोड़ा हैं मैं सुधार कर रहा हूँ। सुनने मैं काफी अच्छा लगता है, लगता है बेचारे नीतीश क्या करें कम बोझ नहीं है। लालू यादव ने तो राज्य को किसी लायक नहीं छोड़ा था। सब कुछ ठीक है लेकिन कुछ चीजें तो सोचने पर मजबूर कर ही देती है।
पांच साल पहले के विधान सभा चुनाव को याद करते हैं, तब नीतीश इतने वाचाल नहीं थे कम मुस्कुराते थे जनता के आगे झुकते थे और ३० महीने में बिहार बदलने की कसमें खाते थे।तब नितीश पर आशाएं अपने आप ही टिक जाती थी, लगता था यहीं है जो हमारी समस्याओं को ख़त्म करेगा। जनता ने वोट भी दिया नीतीश को सिंहासन भी मिल गया हर बिहारी आँखे उठा कर नीतीश की ओरदेखने लगा। सच मानिये तब से लेकर आज तक हर बिहारी इस सौम्य सुदर्शन मुख वाले महारथी की ओर देखता जा रहा है।फटे कपड़े और लपलपाते हुए जीभ से कुछ मिलनेकी आशा में , लेकिन मिला कुछ नहीं , जब भी देते हैं दावे ही देते हैं। अन्य राजनीतिज्ञों की तरह आंकड़े ही दिखाते रह गए तो कहिये हम जैसे बिहारी क्या करें ।
आज फिर जब वो पांच साल पहले की अपनी बात ले कर बैठ गए तो कुछ कहने का मन हुआ, नीतीश तो आज कल किसी की सुनते ही नहीं हैं जीतने की कोई फ़िक्र नहीं है मुद्दे गिना रहे हैं की भविष्य में क्या करेंगे, उनके सरकार के तीन प्रमुख मुद्दे हैं निवेश, शिक्षा, और भूख। याद करें, पांच साल पहले भी यहीं मुद्दे गिनाते थे। एक पत्रकार ने गलती से ये बात याद दिलाई तो बिफर परे कहने लगे,"मेरे पास कोई बटन नहीं है जिसे दबा कर चीजें बदल दूँ."

Wednesday, February 3, 2010

क्या राहुल बाबा सच में बिहारी बन गए है ?

सही कहा गया है, राजनीति एक गिरगिट की तरह है जो अपना रंग आस पास के रंग की तरह बदल लेती है और अगर खुल्ले में कहें तो राजनीति रंग बदलने का ही नाम हैहर वक्त बदलते रहना इसकी खासियत है इसलिए कभी भगवा रंग को राम मंदिर से दूर कर देती है तो कभी अमर को मुलायम से, और तो और ये राजनीति ही है जो रोज भइयोंको राज भैया से पिटवा रही है। आज कल राजनीति का एक और रंग देखने को मिल रहा है। राहुल बाबा की राजनीति , कल तक उत्तर प्रदेश के दलितों के घर रात गुजरने वाले राहुल अब बिहार चले गए हैं कह रहे हैं ,"मुझे भी बिहारी मान कर चलें ,जहाँ भी जरुरत होगी में आपके साथ हूँ। " इन्हें तो पता ही नहीं की बिहारी दुसरो के जरुरत के वक़्त काम आते हैराहुल बाबा को बिहारी की जरुरत पड़ेगी बिहारियों को राहुल बाबा की नहींसही बात तो ये है की राहुल बाबा भी अब गिरगिटिया बनने की कोशीश कर रहे है क्या करे ये राजनीति तो बिरासत में मिली है ना । पर समस्या तो तब होता है जब ये बातें केवल बिहार में ही आकर बोलते हैं , तब नहीं बोलते जब बिहार के बिहारी बंगाल के बिहारी हो गए फिर हरित क्रांति के बाद हरियाणा और पंजाब के बिहारी हो गए कुछ और आगे बढे तो बम्बई तक पहुच गए वंहा भी मदद करने लगे और बिहारी भैया बन गए और फिर राजधानी पहुचे तो बिहारी गाली बन गए अब तो हाल ये है की राजधानी में ही बिहारी का मतलब गाली समझता जाता है पर बाबा राहुल दिल्ली में तो ये बात नहीं बोलते हैं । फिर कैसे माने की राहुल बाबा बिहारी हो गए हैं .

Tuesday, February 2, 2010

कल के मुलायमवादी ..... आज के समाजवादी भी ना रहे .......

अमर आजाद हो गए हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूँ खुद ही कहते फिर रहे हैं, कहते हैं " अब में आजाद हो गया हूँ"। मामला यहाँ तक तो ठीक-ठाक हीं है , लेकिन पलट कर फिर कहते हैं," परिवारवाद, जातिवाद, और तानाशाही से पार्टी नहीं चल सकती " । यहाँ आकर अमर सिंह के समाजवाद की हवा निकल जाती है , हम और आप मजबूर होकर ही सही यह सोचने पर विवश हो जाते हैं की पूंजीवाद का यह समाजवादी रूप इतना बदला-बदला क्यों है रंगमंच, पूंजीवाद और समाजवाद को एक मंच पर ला खड़ा करने वाला यह क्षत्रिय प्रोड्यूसर नेता जिसे बनाने बिगाड़ने की लत है आजादी की दुहाई क्यों दे रहा है । खैर इन इन आसान उत्तर तलाशने के लिए समय की ज्यादा जड़ खोदने की जरुरत नहीं है ।
पीछे मुरकर देखते हैं । एक महीना पहले समाजवादी पार्टी के इस प्रोड्यूसर ने जब पार्टी महासचिव से इस्तीफा दिया तभी समझ में आ गया था की अब इस प्रोड्यूसर को घाटे में चल रही पार्टी का ज्यादा साथ निभाने का मन नहीं है । आज तक हरेक मौके पर मुलायम की शब्द बनकर बोलने बाले अमर ने घोषणा की आज से में मुलायामवादी नहीं रहा ,आज से में समाजवादी हूँ । उनके साथ -साथ उनके प्रोडक्शन यूनिट के सभी लोग साथ के साथ समाजवादी हो गए । पर कल जब उनको पार्टी से निकला गया तो ऐसा लगा की एक और समाजवादी की नैया डूब गयी और साथ के साथ उनकी पूरी प्रोडक्शन यूनिट का ही सफाया हो गया ।
कल का मुलायामवादी आज का समाजवादी भी नहीं रहा ....... हाँ समस्या मुलायम के लिए जरुर है की उनको पार्टी रूपी फिल्म चलने के लिए एक नया प्रोडूसर ढूँढना पड़ेगा। अमर तो अपना गुजरा कर ही लेंगे ।

Monday, February 1, 2010

दिल तो बच्चा है जी ....... इश्क में सब बेवजह होता है

"इश्क" सही कहा  है किसी  ने, उर्दू के इस ढाई अक्षर से बने  अनगिनित कहानियो ने हमारे सामाजिक बन्धनों को सहलाने की कोशिश की है, फिर वो कहानी से हो या फिर गीतों से.  अभी कल ही एक और फिल्म रिलीज़ हुई , नाम है "इश्किया", बिशाल भरद्वाज  और अभिषेक चोबे की फिल्म है. गावों  में कहते है लोग, "इश्किया गये हो का" मतलब इश्क में पागल हो गया लगता है. ऐसे ही एक इश्किया गये ग्रामीण बाला पर केन्द्रित ये फिल्म है
पूरी फिल्म देखकर लगता है की बिशाल भरद्वाज के अन्दर पश्चमी यूपी की आत्मा समा गयी है.  फिल्म की कहानी पर ओमकारा की छाप है पर बढ़िया  निर्देशन के कारण फिल्म ने कहीं  झोल नहीं किया है. सबसे मजेदार की पहलु तो फिल्म के गाने है पुरे क्लास्सिकल गाने और वो भी हारमोनियम और गिटार के साथ, बस दिल को छु जाते  है, बस गुनगुनाने का दिल करता है
हाय ये जोर करे , कितना शोर करे,
बेबजाह बातों पर ये एबे  गौर करे,
दिल सा कोई कमीना नहीं,
डर लगता है इश्क करने में जी  
दिल तो बच्चा है जी,
थोडा कच्चा  है जी ,
दिल तो बच्चा है जी


इस गाने का फिल्मांकन भी अभिषेक चौबे ने बहुत अच्छी तरह किया है , दिल फिर से रोंक और पोप के कानफोरु संगीत से बहार निकल कर गुलजार साहेब के इस दिल को छू लेन बाले गाने को बार बार सुनने को करता है. एक एहसास सा होता है. पता नहीं गुलज़ार साहेब के पास दिल में कितना एहसास भरा है. एक और गीत बहुत  पोपुलर हो रहा है इब्ने बतूता, बगल में जूता.
 पूरी तरह मेट्रो माहोल से दूर , ग्रामीण परिबेश को छूती हुई  इस फिल्म को देखने के बाद  गोरखपुर के आस पास का परिवेश उभर आता है हरेक जाति की अपनी सेना,  जंहा बच्चो को पिछ्वारा धोने से पहले तमंचे पे हाथ रखना सिखाते हैं , लगता है भरद्वाज जी के अन्दर वेस्टर्न यूपी की आत्मा घुस गयी है. कहीं-कहीं  ओमकारा की छवी भी  घुसती नजर आती है लेकिन अच्छे  निर्देशन के कारण पता नहीं चलता .
फ्लिम की कहानी दो लफंगे के बिच फंशी एक ग्रामीण बिबाहित बाला  की कहानी है जो अपने  पति से इतना इश्क करती है की उसकी बेबफाई का बदला लेन के लिए दो मर्दों से प्यार का नाटक करती है. हालाँकि यह गावँ घर में नहीं होता है ये तो पहले ठाकुरों का प्रचलन था या आज कल मेट्रो में होता है वो भी छुप छुप कर. लकिन जब फिल्म में विद्या बालन बन्दुक उठा आशिको पर गोलिया चलाती नजर आती है तब पता चलता है  इश्क के पागलपन में सब कुछ बेबजह ही   होता है. बिद्या बालन  पूरी फिल्म में साडी पहने  इश्क  को फिर से पाने और बेबफाई का पता चलते ही उसका बदला लेते किशना के  केरेक्टर में इतनी  जबरदस्त है की विश्वास  ही नहीं होता की इसने केबल ११ फिल्मो में काम किया है. इतनी परिपक्वता  के साथ किया है की आप इस विश्वास  के साथ कह सकते है की इतनी बेहतरीन एक्टिंग शायद ही किसी के बस की बात है सच कहें तो शहरी  इश्क को गाम और देहात के परिबेश में फिल्माने का हिम्मत वही कर सकती  है .
चलो साल के आरम्भ में ही बार बार देखने को जी करने वाली एक फिल्म देखने का मौका तो मिला.
क्या कहे फिर गीत गुनगुनाने का मान अभी भी करता है ...... चलिए फिर गुनगुनाते है कोई और गीत 
  बड़ी धीरे जली रैना  , धुआ धुआ नयना
रातो से हौले हौले, खोली है केनारी
अखियो ने ताका ताका  भोर उतारी
खरी अखियो से धुआ जाये न  
बड़ी धीरे जली रैना, धुआ धुआ नयना  .................
सही में इश्क में सब बेवजह होता है......... वजह तो ढूँढना पड़ता है.