Monday, February 1, 2010

दिल तो बच्चा है जी ....... इश्क में सब बेवजह होता है

"इश्क" सही कहा  है किसी  ने, उर्दू के इस ढाई अक्षर से बने  अनगिनित कहानियो ने हमारे सामाजिक बन्धनों को सहलाने की कोशिश की है, फिर वो कहानी से हो या फिर गीतों से.  अभी कल ही एक और फिल्म रिलीज़ हुई , नाम है "इश्किया", बिशाल भरद्वाज  और अभिषेक चोबे की फिल्म है. गावों  में कहते है लोग, "इश्किया गये हो का" मतलब इश्क में पागल हो गया लगता है. ऐसे ही एक इश्किया गये ग्रामीण बाला पर केन्द्रित ये फिल्म है
पूरी फिल्म देखकर लगता है की बिशाल भरद्वाज के अन्दर पश्चमी यूपी की आत्मा समा गयी है.  फिल्म की कहानी पर ओमकारा की छाप है पर बढ़िया  निर्देशन के कारण फिल्म ने कहीं  झोल नहीं किया है. सबसे मजेदार की पहलु तो फिल्म के गाने है पुरे क्लास्सिकल गाने और वो भी हारमोनियम और गिटार के साथ, बस दिल को छु जाते  है, बस गुनगुनाने का दिल करता है
हाय ये जोर करे , कितना शोर करे,
बेबजाह बातों पर ये एबे  गौर करे,
दिल सा कोई कमीना नहीं,
डर लगता है इश्क करने में जी  
दिल तो बच्चा है जी,
थोडा कच्चा  है जी ,
दिल तो बच्चा है जी


इस गाने का फिल्मांकन भी अभिषेक चौबे ने बहुत अच्छी तरह किया है , दिल फिर से रोंक और पोप के कानफोरु संगीत से बहार निकल कर गुलजार साहेब के इस दिल को छू लेन बाले गाने को बार बार सुनने को करता है. एक एहसास सा होता है. पता नहीं गुलज़ार साहेब के पास दिल में कितना एहसास भरा है. एक और गीत बहुत  पोपुलर हो रहा है इब्ने बतूता, बगल में जूता.
 पूरी तरह मेट्रो माहोल से दूर , ग्रामीण परिबेश को छूती हुई  इस फिल्म को देखने के बाद  गोरखपुर के आस पास का परिवेश उभर आता है हरेक जाति की अपनी सेना,  जंहा बच्चो को पिछ्वारा धोने से पहले तमंचे पे हाथ रखना सिखाते हैं , लगता है भरद्वाज जी के अन्दर वेस्टर्न यूपी की आत्मा घुस गयी है. कहीं-कहीं  ओमकारा की छवी भी  घुसती नजर आती है लेकिन अच्छे  निर्देशन के कारण पता नहीं चलता .
फ्लिम की कहानी दो लफंगे के बिच फंशी एक ग्रामीण बिबाहित बाला  की कहानी है जो अपने  पति से इतना इश्क करती है की उसकी बेबफाई का बदला लेन के लिए दो मर्दों से प्यार का नाटक करती है. हालाँकि यह गावँ घर में नहीं होता है ये तो पहले ठाकुरों का प्रचलन था या आज कल मेट्रो में होता है वो भी छुप छुप कर. लकिन जब फिल्म में विद्या बालन बन्दुक उठा आशिको पर गोलिया चलाती नजर आती है तब पता चलता है  इश्क के पागलपन में सब कुछ बेबजह ही   होता है. बिद्या बालन  पूरी फिल्म में साडी पहने  इश्क  को फिर से पाने और बेबफाई का पता चलते ही उसका बदला लेते किशना के  केरेक्टर में इतनी  जबरदस्त है की विश्वास  ही नहीं होता की इसने केबल ११ फिल्मो में काम किया है. इतनी परिपक्वता  के साथ किया है की आप इस विश्वास  के साथ कह सकते है की इतनी बेहतरीन एक्टिंग शायद ही किसी के बस की बात है सच कहें तो शहरी  इश्क को गाम और देहात के परिबेश में फिल्माने का हिम्मत वही कर सकती  है .
चलो साल के आरम्भ में ही बार बार देखने को जी करने वाली एक फिल्म देखने का मौका तो मिला.
क्या कहे फिर गीत गुनगुनाने का मान अभी भी करता है ...... चलिए फिर गुनगुनाते है कोई और गीत 
  बड़ी धीरे जली रैना  , धुआ धुआ नयना
रातो से हौले हौले, खोली है केनारी
अखियो ने ताका ताका  भोर उतारी
खरी अखियो से धुआ जाये न  
बड़ी धीरे जली रैना, धुआ धुआ नयना  .................
सही में इश्क में सब बेवजह होता है......... वजह तो ढूँढना पड़ता है.  

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