सही कहा गया है, राजनीति एक गिरगिट की तरह है जो अपना रंग आस पास के रंग की तरह बदल लेती है और अगर खुल्ले में कहें तो राजनीति रंग बदलने का ही नाम है । हर वक्त बदलते रहना इसकी खासियत है इसलिए कभी भगवा रंग को राम मंदिर से दूर कर देती है तो कभी अमर को मुलायम से, और तो और ये राजनीति ही है जो रोज भइयोंको राज भैया से पिटवा रही है। आज कल राजनीति का एक और रंग देखने को मिल रहा है। राहुल बाबा की राजनीति , कल तक उत्तर प्रदेश के दलितों के घर रात गुजरने वाले राहुल अब बिहार चले गए हैं कह रहे हैं ,"मुझे भी बिहारी मान कर चलें ,जहाँ भी जरुरत होगी में आपके साथ हूँ। " इन्हें तो पता ही नहीं की बिहारी दुसरो के जरुरत के वक़्त काम आते है । राहुल बाबा को बिहारी की जरुरत पड़ेगी बिहारियों को राहुल बाबा की नहीं । सही बात तो ये है की राहुल बाबा भी अब गिरगिटिया बनने की कोशीश कर रहे है क्या करे ये राजनीति तो बिरासत में मिली है ना । पर समस्या तो तब होता है जब ये बातें केवल बिहार में ही आकर बोलते हैं , तब नहीं बोलते जब बिहार के बिहारी बंगाल के बिहारी हो गए फिर हरित क्रांति के बाद हरियाणा और पंजाब के बिहारी हो गए कुछ और आगे बढे तो बम्बई तक पहुच गए वंहा भी मदद करने लगे और बिहारी भैया बन गए और फिर राजधानी पहुचे तो बिहारी गाली बन गए अब तो हाल ये है की राजधानी में ही बिहारी का मतलब गाली समझता जाता है पर बाबा राहुल दिल्ली में तो ये बात नहीं बोलते हैं । फिर कैसे माने की राहुल बाबा बिहारी हो गए हैं .
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