बिहार परेशान है क्या करे मुख्यमंत्री साहब ध्यान ही नहीं दे रहे हैं, कहते फिर रहे हैं " मेरे पास कोई बटन नहीं है जिसे दबा कर चीजें बदल दूँ। बड़ी आसानी से कह रहे है जब भी फंसते हैं कह देते है पिछली सरकार ने हालात काफी ख़राब कर छोड़ा हैं मैं सुधार कर रहा हूँ। सुनने मैं काफी अच्छा लगता है, लगता है बेचारे नीतीश क्या करें कम बोझ नहीं है। लालू यादव ने तो राज्य को किसी लायक नहीं छोड़ा था। सब कुछ ठीक है लेकिन कुछ चीजें तो सोचने पर मजबूर कर ही देती है।
पांच साल पहले के विधान सभा चुनाव को याद करते हैं, तब नीतीश इतने वाचाल नहीं थे कम मुस्कुराते थे जनता के आगे झुकते थे और ३० महीने में बिहार बदलने की कसमें खाते थे।तब नितीश पर आशाएं अपने आप ही टिक जाती थी, लगता था यहीं है जो हमारी समस्याओं को ख़त्म करेगा। जनता ने वोट भी दिया नीतीश को सिंहासन भी मिल गया हर बिहारी आँखे उठा कर नीतीश की ओरदेखने लगा। सच मानिये तब से लेकर आज तक हर बिहारी इस सौम्य सुदर्शन मुख वाले महारथी की ओर देखता जा रहा है।फटे कपड़े और लपलपाते हुए जीभ से कुछ मिलनेकी आशा में , लेकिन मिला कुछ नहीं , जब भी देते हैं दावे ही देते हैं। अन्य राजनीतिज्ञों की तरह आंकड़े ही दिखाते रह गए तो कहिये हम जैसे बिहारी क्या करें ।
आज फिर जब वो पांच साल पहले की अपनी बात ले कर बैठ गए तो कुछ कहने का मन हुआ, नीतीश तो आज कल किसी की सुनते ही नहीं हैं जीतने की कोई फ़िक्र नहीं है मुद्दे गिना रहे हैं की भविष्य में क्या करेंगे, उनके सरकार के तीन प्रमुख मुद्दे हैं निवेश, शिक्षा, और भूख। याद करें, पांच साल पहले भी यहीं मुद्दे गिनाते थे। एक पत्रकार ने गलती से ये बात याद दिलाई तो बिफर परे कहने लगे,"मेरे पास कोई बटन नहीं है जिसे दबा कर चीजें बदल दूँ."
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