आज बहुत दिन से देश में न तो मार्क्सवादी और न ही माओवादी खबरों में हैं, आम संवेदनशील साधारण जनता की तरह मुझे भी देश के इन दो धरा के बारे में जानने की इच्छा तो होती ही है, मार्क्सवादी को छोड़ भी दिया जाये तो माओवादी जिसे दुसरे शब्दों में नक्सली कहा जाता है के बारे में कुछ सोचने का मन हुआ है। आखिर कौन है ये नक्सली क्या परेशानी है इनको हमसे या हमको इनसे। ये भी तो हमारी तरह इस देश के नागरिक हैं तो फिर ये प्रशाशन से इतनी दुश्मनी क्यूँ निकल रहे हैं। इन समस्याओं के हल तलाशने के लिए हमें कुछ बारीक़ बातों पर ध्यान देना होगा। देखें तो देश में नक्सल समस्या उन्हीं इलाकों में है जहाँ सरकार पहुँच नहीं पाती है।
सरकारी तंत्र की विफलता इन नक्सल प्रभावित इलाकों में साफ़ दिखाती है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर सरकारी पैसों को हजम करने की कोशिशों से ज्यादा प्रयास कभी नहीं दिखे। सरकार अक्सर ऐसे उपकरणों की तलाश में रहते हैं जिनसे जब चाहे जैसे चाहे नागवार गुजरने वाली आवाज को चुप कराया जा सके। ऐसे में अगर विरोधी स्वर गूंजे तो दबाने की कोशिश तो होगी ही। समय के साथ नक्सलवादी और सरकार के बीच गतिरोध बढ़ता घटता रहता है। खैर ये तो १००% सच है की नक्सल आन्दोलन जायज नहीं है। सच कहें तो नक्सल आन्दोलन कैंसर कोशिकाओं की भांति भारत के विभिन्न हिस्सों में फैलता जा रहा है। क्रांति के नाम पर न केवल अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है, बिदेशी आतंकी संगठनों के साथ सांठ-गांठ की बात सामने आती रहती है। सच कहें तो छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के माध्यम से पहली बार नक्सलियों को वैचारिक और मैदानी दोनों मोर्चों पर शिकस्त देने के प्रयास शुरू हुए। बताते चलूँ की सलवा जुडूम एक ऐसा आन्दोलन है जिसमे नक्सलियों से लड़ने के लिए सरकारके मदद से ग्रामीण इलाकों में फ़ौज तयार किया जाये।
अंत में कुछ ऐसा जिसके बारे में शायद कम ही लोगों को पता हो, पंजाब के मशहूर नक्सलवादी नेता हकम सिंह ने यदि मनमोहन सिंह को बचने की कोशिश नहीं की होती तो वे इस समय नक्सलवादियों के समर्थक होने के इल्जाम में जेल में होते।अतः ये सच है की देश में बढ़ता नक्सलवाद हमारे, आपके सभी के लिए चिंता का विषय है, लेकिन हमें इन नक्सलवादियों से नफ़रत करने से पहले इनके समस्याओं के मर्म को समझाने होगा क्यूँ की आखिर वो भी इन्सान है?
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