Sunday, May 30, 2010

चीयर बालाओ का चीयर करियर



आज नहीं तो कल कभी न कभी ऐसा दिन आएगा जब हरेक खेल में चीयर बालाओ का होना अनिवार्य कर दिया जायेगा . लेकिन ये किस रूप में होगा ये कहना तो अभी मुस्किल है परन्तु हम कल्पना के घोड़े तो दौड़ा ही सकते है . मनुष्य का काल्पनिक होना बहुत जरुरी है और कल्पना के घोड़े दौड़ाने भी चाहिए . कल्पना कीजिये मैच शुरु होने वाला  है सभी अपने अपने जगह पे तैयार हैं चीयर बालाओ के साथ, और  रीतिकाल के विशेषग्य कमेन्ट्री कर रहे होंगे कुछ इस तरह :  
                        चीयर  बालाओ ने तीन  ठुमके लेफ्ट साइड के स्टैंड के लोगो के लिए लगाये और अगली गेंद पर जब चौथे ठुमके की मांग दर्शक कर रहे  थे तब उसने रिवर्स ठुमका लगाया और ये राईट साइड स्टैंड के लोगो के कलेजे  के पार. तब चीयर बालाओ की  रेंकिंग  होगी,  फलाना चीयर  बाला चिअरिंग के लिए बचपन से ही समर्पित है तेंदुलकर की तरह ,कितने मैच में तो टीम इनके ठुमको के बजह से ही जीती है .ड्रो होने पे चीयर  बालाओ के ठुमके से ही जीत का फैलसा होगा की किस टीम के बालाओ ने कितने सफाई के साथ ठुमके लगाये . किसी खिलाडी को मैदान से बहार का रास्ता दिखाना है तो उसके पीछे फील्डर लगाने की जरुरत नहीं है एक युबा चीयर बाला को उसके सामने लगा दो , खिलाडियों के पोजीसन चेंज करने से जायदा प्राथमिकता चीयर   बालाओ के पोजिसन पर होगा की कौन सी  बाला को किस पोजीसन पार लगाया जाय . मुझे तो ऐसे लगता है की जैसे लडको के खेल में चीयर बालाओ को लगाया जाता है उसी तरह लड़कियों के खेल के लिए चीयर  बालकों  को लगाया जायेगा . संभाबना इसकी भी कम नहीं है की चीएर बालाओ के जीत पे देश की जीत माना जाये और हार पे देश की हार.


भाई ये खेल का नशा नहीं है ये तो चीएर बालिकाओ/बालक  का नशा है जिसके पीछे सारा देश पगलाया घूमता है इसके ग्लैमर के पीछे टुन्न ........

Sunday, May 16, 2010

बाजार की नई पहचान - "ही"

आईआईएम अहमदाबाद वाले फालतू की चीज़ों पर रिसर्च करते रहते हैं। कभी इस पर रिसर्च करनी चाहिए कि बाज़ार जगत में 'ही' का क्या महत्व है। 'ही' लगाने से किस तरह की uniqueness  का निर्माण होता है। इसकी शुरूआत कैसे हुई। रिश्ते ही रिश्ते से चलकर शीशे ही शीशे,बिस्तरे ही बिस्तरे,नौकरी ही नौकरी से होते हुए हर एक माल वाली दुकान की punch लाइन बन गई । छुट ही छुट  ।" ही" शब्द का इस्तमाल जितना साहित्यकारों ने नहीं किया उतना हिन्दी के बाज़ार ने किया है। दुकानों की भीड़ में " ही" एक अलग पहचान देती है। लगता है कि दुकानदार विशेषज्ञ है लोगो का ध्यान खीचने में । कई बार होता है तो कई बार "ही" के सहारे झांसा भी देता है। आप को भी "ही" गंथ की रचना में सहयोग देना चाहिए । किसी न्यूज़ चैनल या अखबार इस punch लाइन का use क्यों नहीं करती  है-ख़बरें ही ख़बरें,देख तो लें। डॉक्टर अपने बोर्ड के नीचे लिखवा दें-इलाज ही इलाज । कामनवेल्थ गेम्स का नारा बदलवा दीजिए। खेल ही खेल। केंद्र सरकार को भी इससे सिख लेनी चाहिए ,नरेगा ही नरेगा ,महिलाओ के लिए आरक्षण ही आरक्षण ,सर्बजनिक स्थल पर लिख दे पुरुष ही पुरुष , महिलाये ही महिलाये ,अब तो नारायणमूर्ति को भी लिखना चाहिए-इंफोसिस,बीपीओ ही बीपीओ। कंपनी अपने आप गांव गांव में पहुंच जाएगी। इसकी लोकप्रियता में चार चांद लग जायेंगे।


अब तो ऐसा लगता है  "ही " हीमैन बन गया है।



Thursday, May 13, 2010

हमारी पहचान क्या है नाम या नंबर ?



नाम ग़ुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है। ग़र याद रहे। बॉलीवुड का यह पोपुलर गाना आज सच साबित हो रहा है।  पहचान के तमाम निशान आपकी आवाज़ और आपके फ़ोन नंबर  में रह गये हैं ।  
तब से सोच रहा हूं कि क्या अब मोबाइल का नंबर हमारी पहचान का नया हिस्सा बन चुका है। क्या अब हम नंबर से पहचाने जाने लगे हैं। फोन नंबर को लेकर हमारी झिझक खतम हो गई है। पहले हम नंबर सभी को नहीं बताते थे। छुपाते थे। अब नाम से पहले नंबर या नाम के साथ नंबर ज़रूर बताते हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे लगते हैं।
हमारे देश में पहचान को लेकर सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर कोशिशें चलती रहती हैं।लोग अपनी पहचान खुद गढ़ रहे हैं। कई लोग दीवारों पर सिर्फ नंबर छोड़ कर अनंत संसार में गुम हो जाते हैं। डायल कीजिए और आपको मिल जायेंगे। नंबर अलग अलग होता है। एक नाम के सौ लोग होते हैं। एक इलाके और एक भाषा के सौ लोग होते हैं। एक नंबर का एक ही आदमी होता है। नंबर तभी मिलता है जब आपकी पहचान सत्यापित होती है। पता सही होता है। मोबाइल नंबर है तो आदमी फर्ज़ी नहीं हैं। ये भाव पैदा हो रहा है। यह एक बड़ा बदलाव हमारे समाज में हो चुका है।
सारी बातें दिमाग़ में इसलिए घूम रही हैं क्योंकि सरकार यूनिक पहचान नंबर ला रही है। क्या हम देख पा रहे हैं कि नंबर अभी से ही हमारी पहचान का हिस्सा बन चुका है। यूनिक पहचान नंबर  समझने की कोशिश कर रहा हूं कि यह कैसे हो रहा है कि नाम की जगह नंबर प्रमुख होता जा रहा है। मेरा नंबर ही मेरी पहचान है। ग़र याद रहे। क्या ऐसे भी गाना गाया जाएगा।
 आज आईडिया कंपनी का बिज्ञापन सच प्रतीत हो रहा है  ।