Thursday, May 13, 2010
हमारी पहचान क्या है नाम या नंबर ?
नाम ग़ुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है। ग़र याद रहे। बॉलीवुड का यह पोपुलर गाना आज सच साबित हो रहा है। पहचान के तमाम निशान आपकी आवाज़ और आपके फ़ोन नंबर में रह गये हैं ।
तब से सोच रहा हूं कि क्या अब मोबाइल का नंबर हमारी पहचान का नया हिस्सा बन चुका है। क्या अब हम नंबर से पहचाने जाने लगे हैं। फोन नंबर को लेकर हमारी झिझक खतम हो गई है। पहले हम नंबर सभी को नहीं बताते थे। छुपाते थे। अब नाम से पहले नंबर या नाम के साथ नंबर ज़रूर बताते हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे लगते हैं।
हमारे देश में पहचान को लेकर सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर कोशिशें चलती रहती हैं।लोग अपनी पहचान खुद गढ़ रहे हैं। कई लोग दीवारों पर सिर्फ नंबर छोड़ कर अनंत संसार में गुम हो जाते हैं। डायल कीजिए और आपको मिल जायेंगे। नंबर अलग अलग होता है। एक नाम के सौ लोग होते हैं। एक इलाके और एक भाषा के सौ लोग होते हैं। एक नंबर का एक ही आदमी होता है। नंबर तभी मिलता है जब आपकी पहचान सत्यापित होती है। पता सही होता है। मोबाइल नंबर है तो आदमी फर्ज़ी नहीं हैं। ये भाव पैदा हो रहा है। यह एक बड़ा बदलाव हमारे समाज में हो चुका है।
सारी बातें दिमाग़ में इसलिए घूम रही हैं क्योंकि सरकार यूनिक पहचान नंबर ला रही है। क्या हम देख पा रहे हैं कि नंबर अभी से ही हमारी पहचान का हिस्सा बन चुका है। यूनिक पहचान नंबर समझने की कोशिश कर रहा हूं कि यह कैसे हो रहा है कि नाम की जगह नंबर प्रमुख होता जा रहा है। मेरा नंबर ही मेरी पहचान है। ग़र याद रहे। क्या ऐसे भी गाना गाया जाएगा।
आज आईडिया कंपनी का बिज्ञापन सच प्रतीत हो रहा है ।
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