Sunday, January 31, 2010

भाई सुना आपने " दरोगा जी को प्रोमोसन मिल गया "

 सन्डे के दिन चाय पीने के बाद सोचा न्यूज़ देख लें टीवी पर , थोड़ी देर न्यूज़ का सिनेमाई ढंग देखने के बाद मन उब गया, और हमेश की तरह  चैनल चेंज करने लगा इसी दौरान एक चैनल पर आ रहे  एक सिनेमा पर एकाएक ही नजर पर गयी  देखा तो दरोगा जी का डंडा  बरस रहा था और हीरो पीट रहा था , बहुत दिनों के बाद सिनेमा में दरोगा जी को देख कर बहुत मजा आया वरना आज कल तो सिनेमा में दरोगा जी दिखते ही नहीं हैं , कभी जगदीश राज और इफ्तकार साहेब फेमस दरोगा हुआ करते थे और अमिताभ ,धर्मेन्द्र ,शशि कपूर ,शत्रु भैया भी इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर का रोल कर चुके हैं, कल तक सिनेमा का सेंट्रल केरेक्टर दरोगा साहेब आज कल तो फिल्मो में दिखते ही नहीं हैं . हांल के दिनों में शायद ही कोई फिल्म आई है जिसमे दरोगा जी दिखे हैं, एक आध को छोरकर, जैसे शूल में मनोज बाजपाई. अब तो सरफ़रोश में आमिर खान आते हैं एसीपी बनकर और अनुपम खेर आते है पुलिस  कमिसनर बनकर बिना कंप्यूटर ज्ञान के,  तो कभी अभिषेक भइया आते ही एसीपी बनकर चोर को पकरने के लिए,  लगता है फिल्मो के सभी दरोगाओं  को प्रोमोसन मिल गया है. इस तरह तो कुछ ही दिनों में फ़िल्मी पुलिस वाले  रिटायर  कर जायंगे  तो फिर चोर लुटेरो को पकरने कौन आएगा तो क्या सिंह साहेब( फिल्मों के दरोगा ) रिटायर  होने के बाद सरकार को मदद करेंगे आतंकबादीयों  को पकरने में.  सही है भाई  प्रेमचंद के किताबो क़ा दरोगा  उम्र की दहलीज पार  कर  प्रोमोसन पा लिया है .
कभी दरोगा क़ा मतलब होता था दा रो गा के माने रोते गाते रहो पर घुस पहुचाते रहो ,  अब दरोगा जी को प्रोमोसन मिल गया है भाई, पता नहीं आगे क्या होगा ...........

Friday, January 29, 2010

cartoon of the day


take a look of new i pad from apple

आजादी के बाद हम

भारत ने गणतंत्र के अपने साठवे वर्ष को देख लिया है, एक ऐसा समय जब भारत आर्थिक मंदी से बचकर सात आठ फ़ीसदी से तरक्की कर रहा है . इन बीते वर्षों में भारत ने प्रतिष्ठा भी काफी कमाया है , आज अन्तराष्ट्रीय मंच पर भारत का अपना एक अलग रुतबा है . क्रिकेट से लेकर रंगमंच तक हर जगह हम तरक्की कर रहे है . सब कुछ सौम्यता से श्रेष्ठता की ओर बढ़ता जा रहा है , ऐसे में कुछ प्रश्न अपने आप आ खड़े होते हैं , क्या देश के मार्गदर्शक नेतागण देश को सही रस्ते पर ले जा रहे हैं ? क्या देश के नागरिक अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभा रहे हैं ,क्या यही हमारे शहीदों के सपने का भारत है .
     आइए इन कुछ नए कटु प्रश्नों के वास्तविक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं . देश के घरेलु परिदृश्य पर गौर करें तो देश के अन्नदाता किसान अन्न को तरश रहे हैं ,आम इन्सान ना चीनी खरीद पा रहा है और न नमक . सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को छठा वेतन  दिया लेकिन वह भी बेकार , बढाती मंहगाई के कारण यह आमदनी भी कम दिखाई दे रही है . निजी कर्मचारियों और मजदूरो की तो कोई बात ही नहीं, वह तो किसी तरह अपना जीवन काट ही रहे हैं . दूसरी ओर सरकार के दृश्य -अदृश्य प्रयास के बावजूद भी भ्रष्टाचार कायम है . जिस जातिगत भावना को  कम करने  के लिए राजा राम मोहन जैसे महापुरुषों ने दिन रात एक कर दिया उसी भावना को  हमारे नेताओ ने स्वार्थ के चलते मंडल-कमंडल से  बाँट दिया . आज कोई अल्पसंखकों को तो कोई आदिवासियों को , कोई यादवों की तो कोई जाटवों को , कोई दलितों की तो कोई महादलितों कीबात करता है यूँ कहें  तो  हर मार्गदर्शक अपना एक जात पकड़ कर बैठा है . 
हम जनकल्याण को नहीं कल्याण को अपनी जरुरत मान  बैठे हैं , राष्ट्रीय पर्व पर माल्स में डिस्काउंट सेल की तलाश करते हैं . अपनी सोच से हम लोकतान्त्रिक सत्ता को सरकार मान बैठे हैं और चंद अनपढ़ लोगों को अपना राजा , फिर हम किस लिहाज से अपने-आप को नागरिक कहते हैं . किस हक से नेताओं को . अधिकारीयों को . प्रशाशन को भ्रष्ट कहते हैं सबसे बड़े भ्रष्ट तो हम खुद हैं जो अपने इमान के लिए बेईमान हैं . मैं अब इस बात पर बहश नहीं करूँगा की हमने इन 60  वर्षों में क्या खोया क्या पाया बस इतना कह सकता हूँ जो पाया उसे भी सहेज न सके बस अपने इन चंद छद्म मार्गदर्शक को गलियां देते रह गये .  

ब्रेकिंग न्यूज : सानिया की सगाई टूट गई है

आज सुबह मेरी नजर समाचार पत्र के एक खबर पर पड़ी , मोटे- मोटे अक्षरों में  हेडलाइन थी  "सानिया मिर्जा की सगाई टूट गई ". तभी मेरी सालों से दबी हुई जिज्ञासा जाग गई की ये सगाई या एन्गेजमेंट  का मतलब क्या है? क्या इसका केबल ये मतलब निकला जाय की दो खाली लोगो को इन्गेज कर दिया जाए और जब तक एन्गेज रहने का मन हो तब तक रहिये और उसके बाद फ्री हो जाइये . बचपन में दादी  शादी  के बारे में बताती थी की लड़की के पिताजी लड़के  के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए  पंजिकार(आजकल उसको शादीराम घरजोड़े कहते हैं)  के पास जाते थे और वही पर अपने मनमाफिक रिश्ता चुनते थे और उसी पंजिकर के हाथ लड़के वालो के यहाँ अपनी लड़की का रिश्ता भेजते थे और लड़के वालो को रिश्ता पसंद  आने पर रिश्ता तय भी हो  जाता था और तब दोनों परिवार वाले रिश्तेदारों के साथ रिश्ता तय कर देते  थे फिर शादी हो जाती थी, लकिन तब शादी से पहले के इस रस्म का कोई नाम नहीं था. उस ज़माने में बिरले ही कोई रिश्ता टूटता था, लकिन जब से इसका नाम सगाई या इगेजमेंट दिया गया है पता नहीं क्यों, ये सगाई क्यों टूट जाती है शादी तक तो पहुँच  ही नहीं पाती है . तो क्या एक  रश्म को नाम दिए जाने से इतन बदलाब आ सकता है. मेरे एक दोस्त है बिमलजी,  शादी शुदा है, कभी खुद से बाज़ार नहीं जाते खरीददारी के लिए, मिसेज ही परचेजिंग  करती हैं , एक दिन संयोग से बाज़ार चले गये फिर शाम को मेरे पास पहुँच गये कहानी बताने की रोमेश जी क्या पूछते है अब तो दिन ये आ गये हैं की बाज़ार में किसी सामान पर गारंटी नाम की कोई चीज रह ही नहीं गयी है शिर्फ़ वारंटी ही मिलती है , लकिन आज में विमलजी की बातों से इत्तफाक नहीं रखता की गारंटी नहीं मिलती है ये एंगेजमेंट एक ऐसा सामान है जिस पर गारंटी अभी भी लागू है. जब तक निभ रही है निभाओ नहीं तो बदल डालो . "रिश्ता " जो हमे हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा से बिरासत में मिली है की उसकी डूराबिलिटी इतनी कम हो गयी है की वो चाइनीज सामान की तरह हो गयी है "यूज एंड थ्रो"
जिसने इस रश्म का नामकरण  "सगाई " किया था .......  व्हाट अ आईडिया सर जी ............. 

Wednesday, January 27, 2010

राजद का वृहस्पतिवार को बिहार बंद




राष्ट्रीय जनता दल ने बढ़ती मंहगाई सहित कई मुद्दों को लेकर २८ को बिहार बंद का ऐलान किया है । आवश्यक सेवाओं को बंद से मुक्त रखा गया है । बंद को देखते हुए पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये हैं । पुलिस मुख्यालय के अनुसार राज्य के सभी जिला पुलिस अध्यक्षों को बंद के दौरान अति आवश्यक सेवाओं को प्रभावित करने वाले लोगों के साथ सख्ती से पेश आने का निर्देश दिया गया है ।


आस्ट्रेलियन ओपन


वीनस हारी ,फेडरर जीते , पेस आगे बढे ।

आस्ट्रेलियन ओपन टेनिस में बुधवार को हुए उलटफेर में वीनस विलियम्स को चीन की ना ली ने हराकर सेमी फाइनल  में प्रवेश कर लिया । टूर्नामेंट में भारत के एकमात्र उम्मीद लिएंडर पेस पुरुष युगल से तो बहार हो गए लेकिन मिश्रित युगल के सेमी फाइनल  में उन्होंने अपना  जगह बना लिया । उधर सेरेना विलियम्स और रोजर फेडरर एकल मुकावलों के सेमी फाइनल  में पहुँच गए हैं । वहीं रफाल नडाल पहले हीं बाहर हो चुके हैं ।

कुछ बातें महारथियों के

  1. लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराना दुर्भाग्यपूर्ण - मुरली मनोहर जोशी (वरिष्ठ भाजपा नेता )
  2. राष्ट्रीय चुनावों में अनिवार्य मतदान सही नहीं - नवीन चावला (मुख्य चुनाव आयुक्त )
  3. हेडली ने एफबीआई के लिए काम किया - राहुल भट्ट (महेश भट्ट के पुत्र )
  4. अमर सिंह राज्य सभा से इस्तीफा दें - मोहन सिंह (सपा नेता)
  5. तमिलों को साझेदार बनाएँगे - राजपक्षे (श्रीलंकन राष्ट्रपति)

ताजा खबर


राजपक्षे ने राष्ट्रपति चुनाव जीता

श्रीलंका में महिंद्रा राजपक्षे ने बुधवार को राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है । श्रीलंका के राष्ट्रपति सचिवालय के एक अधिकारी ने कहा की चुनाव नतीजो की घोषणा बाद में होगी । राजपक्षे ने २६ साल के खुनी संघर्ष के बाद हुए चुनाव में यह जीत हासिल किया है । श्रीलंका में छठे राष्ट्रपति चुनाव में करीब ७० फ़ीसदी वोटिंग हुई है , श्रीलंकन चुनाव विभाग के अनुसार १४,८८,५०० लोगो ने वोट डाला है । वही ताजा घटनाक्रम में मुख्य विपक्षी फोंसका के होटल को श्रीलंकन सैनिको ने घेर लिया है । सेना के प्रवक्ता उदय नानायाक्कारा ने कहा की फोंसका को गिरफ्तार करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है । उन्होंनेने कहा,' हमें पता चला है की वहां सेना के करीब ४०० pउर्वा कर्मी हैं हम सिर्फ उनकी मौजूदिगी पर नजर रख रहे हैं और देख रहे है की वो कोई परेशानी न पैदा करें ।

ज़हीर खान ने मीरपुर टेस्ट में १० विकेट लिए .


कुछ chhaviya


भारतीयों टीम ने पिद्दी बंगला देशी टीम को धो डाला । सचिन और ज़हीर ने टीम की जीत में अहम् योगदान दिया

खबर 27.11.2010

  1. श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में राजपक्षे को बढ़त
श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव के शुरूआती नतीजो में महिंद्रा राजपक्षे को अपने प्रतिद्वंदी सरथ फोंसेको पर बढ़त हासिल हुई है । राजपक्षे को अब तक हुए मतगणना में ६० फीसदी मत प्राप्त हुए हैं । लेकिन चुनाव अधिकारियो का कहना है की अभी बहुत संख्या में मतों की गिनती की जनि है । श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम बुधवार शाम तक आने की उम्मीद है ।
२.तालिबान नेताओ से प्रतिबन्ध हटा

संयुत्क्त राष्ट्र ने तालिबान नेताओ से अपना प्रतिबन्ध हटा दिया है ताकि संगठन में नरमपंथी उग्रवादियों के साथ बातचीत का रास्ता साफ हो सके । सूची में पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल वकील मुतावाकिल सहित कई अन्य मुख्य नेता शामिल हैं

३.अमर की जगह मोहन सिंह सपा के महासचिव व प्रवक्ता बने

समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव व प्रवक्ता पद से इस्तीफा देने वाले अमर सिंह की जगह मोहन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव व प्रवक्ता बनाया है।

४आस्ट्रेलिया ने हमलो से संवंधित दस्तावेज सौपे

आस्ट्रेलिया सरकार ने साल भारतीयों पर हुए हमलो से संवंधित दस्तावेज सोंपे हैं जिससे पता चलता है की करीब आधे अधिक हमलावर १८ वर्ष से कम उम्र के थे ।

५.मीरपुर में भारत जीता

मीरपुर में खेले गए दुसरे मैच में १० विकेट से हरा दिया है । आइडिया कप नाम से खेली गयी ये श्रंखला भारत ने २-० से जीत लिया है । दूसरी पारी में बेहतरीन गेंदबाजी कर १० विकेट लेने वाले जहीर खान को 'मैंन ऑफ़ दी मैच चुना गया। साथ ही जहीर खान को मैंन ऑफ़ दी सीरिज भी घोषित किया गया जहीर ने कुल मिला कर १५ विकेट लिए हैं ।

Thursday, January 7, 2010

थ्री इडीऐट

थ्री इडीऐट ये एक फिम्ल है पर मै यंहा पर फिल्म के बारे में बात नहीं करूँगा. क्या ये शीर्षक हमारे समाज के आज के समय में हम लोगों के ब्याक्तिगत और सामाजिक स्थिति से जुड़ा हुआ नहीं है? अगर इसके पहलुओ पर गौर करे तो आज समाज में कौन है जो इस फिल्म के शीर्षक को सच में सही साबित कर रहा है! हमारे लोगो के बीच कुछ लोग है जो हमारी बातो को नजरंदाज करते है, हमारी परेशानियों को, हमारी कोशिशो को और हमारी हालत को नजरंदाज करते हैं, वो समझ ही नहीं पाते की हम क्या चाहते है ,हमको क्या चाहिए या वो समझाना ही नहीं चाहते है, वो तो वही करते है जो उनको अच्छा लगता है, उनके फायदे में होता है, और वो लोग है कौन जिनको हमारे बारे में सोचना चाहिए, कुछ करना चाहिए, हमारी भलाई के लिए, हमारे समाज के भलाई के लिए.  वो तीन लोग है नेता, प्रशासन और न्यायालय. हमारे देश में इन तीनो को लगभग सारे अधिकार दिए गए है, हम जनता के पास तो एक अधिकार है, नेता चुनने का वो भी पांच साल के बाद ,पर उन पांच सालो में इन पर लगाम लगाने का कोई अधिकार नहीं है अगर अधिकार  है  भी तो बांकी दो उस अधिकार का इस्तेमाल करने से हर संभव रोकते हैं . स्कूल में नैतिक शिक्षा का जो क्लास होता है उसमे बच्चों तो सिखाया जाता है बुरा मत सुनो,बुरा मत देखो और बुरा मत बोलो, इन तीनो वाक्यों को  गाँधी जी  के तीन बन्दर के रूप में बताया जाता है, लेकिन आज के हालत में क्या इन तीनो नियमो का को कोई अर्थ रह गया है ?  क्या हमारे समाज के तीनो स्तम्भ इन मौलिक नियमो, या यों कहें के गाँधी जी के तीन उसूलो पर अमल करते हैं यंहा तो हालत ये है की नेता जनता की सुनते नहीं ,प्रशासन जनता की परेशानियों तो देखता नहीं और न्यायालय इतना होने के बाद भी कुछ बोलता नहीं, 
क्या ये नहीं लगता ही इन तीनो बन्दर अब इस रूप में हो गए हैं. 





कभी ये तीनो बन्दर जो कभी नैतिक शिक्षा के प्रतिक थे क्या ये आज हमारे तीनो संबैधानिक पहरेदारों के स्थिति को नहीं दर्शाते  हैं .