आइए इन कुछ नए कटु प्रश्नों के वास्तविक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं . देश के घरेलु परिदृश्य पर गौर करें तो देश के अन्नदाता किसान अन्न को तरश रहे हैं ,आम इन्सान ना चीनी खरीद पा रहा है और न नमक . सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को छठा वेतन दिया लेकिन वह भी बेकार , बढाती मंहगाई के कारण यह आमदनी भी कम दिखाई दे रही है . निजी कर्मचारियों और मजदूरो की तो कोई बात ही नहीं, वह तो किसी तरह अपना जीवन काट ही रहे हैं . दूसरी ओर सरकार के दृश्य -अदृश्य प्रयास के बावजूद भी भ्रष्टाचार कायम है . जिस जातिगत भावना को कम करने के लिए राजा राम मोहन जैसे महापुरुषों ने दिन रात एक कर दिया उसी भावना को हमारे नेताओ ने स्वार्थ के चलते मंडल-कमंडल से बाँट दिया . आज कोई अल्पसंखकों को तो कोई आदिवासियों को , कोई यादवों की तो कोई जाटवों को , कोई दलितों की तो कोई महादलितों कीबात करता है यूँ कहें तो हर मार्गदर्शक अपना एक जात पकड़ कर बैठा है .
हम जनकल्याण को नहीं कल्याण को अपनी जरुरत मान बैठे हैं , राष्ट्रीय पर्व पर माल्स में डिस्काउंट सेल की तलाश करते हैं . अपनी सोच से हम लोकतान्त्रिक सत्ता को सरकार मान बैठे हैं और चंद अनपढ़ लोगों को अपना राजा , फिर हम किस लिहाज से अपने-आप को नागरिक कहते हैं . किस हक से नेताओं को . अधिकारीयों को . प्रशाशन को भ्रष्ट कहते हैं सबसे बड़े भ्रष्ट तो हम खुद हैं जो अपने इमान के लिए बेईमान हैं . मैं अब इस बात पर बहश नहीं करूँगा की हमने इन 60 वर्षों में क्या खोया क्या पाया बस इतना कह सकता हूँ जो पाया उसे भी सहेज न सके बस अपने इन चंद छद्म मार्गदर्शक को गलियां देते रह गये .

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