Friday, January 29, 2010

आजादी के बाद हम

भारत ने गणतंत्र के अपने साठवे वर्ष को देख लिया है, एक ऐसा समय जब भारत आर्थिक मंदी से बचकर सात आठ फ़ीसदी से तरक्की कर रहा है . इन बीते वर्षों में भारत ने प्रतिष्ठा भी काफी कमाया है , आज अन्तराष्ट्रीय मंच पर भारत का अपना एक अलग रुतबा है . क्रिकेट से लेकर रंगमंच तक हर जगह हम तरक्की कर रहे है . सब कुछ सौम्यता से श्रेष्ठता की ओर बढ़ता जा रहा है , ऐसे में कुछ प्रश्न अपने आप आ खड़े होते हैं , क्या देश के मार्गदर्शक नेतागण देश को सही रस्ते पर ले जा रहे हैं ? क्या देश के नागरिक अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभा रहे हैं ,क्या यही हमारे शहीदों के सपने का भारत है .
     आइए इन कुछ नए कटु प्रश्नों के वास्तविक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं . देश के घरेलु परिदृश्य पर गौर करें तो देश के अन्नदाता किसान अन्न को तरश रहे हैं ,आम इन्सान ना चीनी खरीद पा रहा है और न नमक . सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को छठा वेतन  दिया लेकिन वह भी बेकार , बढाती मंहगाई के कारण यह आमदनी भी कम दिखाई दे रही है . निजी कर्मचारियों और मजदूरो की तो कोई बात ही नहीं, वह तो किसी तरह अपना जीवन काट ही रहे हैं . दूसरी ओर सरकार के दृश्य -अदृश्य प्रयास के बावजूद भी भ्रष्टाचार कायम है . जिस जातिगत भावना को  कम करने  के लिए राजा राम मोहन जैसे महापुरुषों ने दिन रात एक कर दिया उसी भावना को  हमारे नेताओ ने स्वार्थ के चलते मंडल-कमंडल से  बाँट दिया . आज कोई अल्पसंखकों को तो कोई आदिवासियों को , कोई यादवों की तो कोई जाटवों को , कोई दलितों की तो कोई महादलितों कीबात करता है यूँ कहें  तो  हर मार्गदर्शक अपना एक जात पकड़ कर बैठा है . 
हम जनकल्याण को नहीं कल्याण को अपनी जरुरत मान  बैठे हैं , राष्ट्रीय पर्व पर माल्स में डिस्काउंट सेल की तलाश करते हैं . अपनी सोच से हम लोकतान्त्रिक सत्ता को सरकार मान बैठे हैं और चंद अनपढ़ लोगों को अपना राजा , फिर हम किस लिहाज से अपने-आप को नागरिक कहते हैं . किस हक से नेताओं को . अधिकारीयों को . प्रशाशन को भ्रष्ट कहते हैं सबसे बड़े भ्रष्ट तो हम खुद हैं जो अपने इमान के लिए बेईमान हैं . मैं अब इस बात पर बहश नहीं करूँगा की हमने इन 60  वर्षों में क्या खोया क्या पाया बस इतना कह सकता हूँ जो पाया उसे भी सहेज न सके बस अपने इन चंद छद्म मार्गदर्शक को गलियां देते रह गये .  

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