थ्री इडीऐट ये एक फिम्ल है पर मै यंहा पर फिल्म के बारे में बात नहीं करूँगा. क्या ये शीर्षक हमारे समाज के आज के समय में हम लोगों के ब्याक्तिगत और सामाजिक स्थिति से जुड़ा हुआ नहीं है? अगर इसके पहलुओ पर गौर करे तो आज समाज में कौन है जो इस फिल्म के शीर्षक को सच में सही साबित कर रहा है! हमारे लोगो के बीच कुछ लोग है जो हमारी बातो को नजरंदाज करते है, हमारी परेशानियों को, हमारी कोशिशो को और हमारी हालत को नजरंदाज करते हैं, वो समझ ही नहीं पाते की हम क्या चाहते है ,हमको क्या चाहिए या वो समझाना ही नहीं चाहते है, वो तो वही करते है जो उनको अच्छा लगता है, उनके फायदे में होता है, और वो लोग है कौन जिनको हमारे बारे में सोचना चाहिए, कुछ करना चाहिए, हमारी भलाई के लिए, हमारे समाज के भलाई के लिए. वो तीन लोग है नेता, प्रशासन और न्यायालय. हमारे देश में इन तीनो को लगभग सारे अधिकार दिए गए है, हम जनता के पास तो एक अधिकार है, नेता चुनने का वो भी पांच साल के बाद ,पर उन पांच सालो में इन पर लगाम लगाने का कोई अधिकार नहीं है अगर अधिकार है भी तो बांकी दो उस अधिकार का इस्तेमाल करने से हर संभव रोकते हैं . स्कूल में नैतिक शिक्षा का जो क्लास होता है उसमे बच्चों तो सिखाया जाता है बुरा मत सुनो,बुरा मत देखो और बुरा मत बोलो, इन तीनो वाक्यों को गाँधी जी के तीन बन्दर के रूप में बताया जाता है, लेकिन आज के हालत में क्या इन तीनो नियमो का को कोई अर्थ रह गया है ? क्या हमारे समाज के तीनो स्तम्भ इन मौलिक नियमो, या यों कहें के गाँधी जी के तीन उसूलो पर अमल करते हैं यंहा तो हालत ये है की नेता जनता की सुनते नहीं ,प्रशासन जनता की परेशानियों तो देखता नहीं और न्यायालय इतना होने के बाद भी कुछ बोलता नहीं,
क्या ये नहीं लगता ही इन तीनो बन्दर अब इस रूप में हो गए हैं.
कभी ये तीनो बन्दर जो कभी नैतिक शिक्षा के प्रतिक थे क्या ये आज हमारे तीनो संबैधानिक पहरेदारों के स्थिति को नहीं दर्शाते हैं .
1 comment:
kdiya badiya likha ranjan ji apne ...........
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